Ramayan EP 22 - राजा दशरथ की अन्त्येष्टि
Description
रामानंद सागर कृत 'रामायण' (1987) का बाईसवां (22वां) एपिसोड एक अत्यंत मर्मस्पर्शी, भावनात्मक और करुणा से ओत-प्रोत अध्याय है। यह एपिसोड अयोध्या के चक्रवर्ती सम्राट राजा दशरथ के दुखद निधन के पश्चात की घटनाओं, अयोध्या में पसरे गहरे शोक और उनके अंतिम संस्कार की वैदिक विधि को अत्यंत विस्तार और संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करता है। श्री राम, लक्ष्मण और माता सीता के वन चले जाने के बाद राजा दशरथ का हृदय इस भयंकर वियोग की पीड़ा को सहन नहीं कर पाता। "राम... हा राम... हा रघुनंदन..." विलाप करते हुए तड़प-तड़प कर उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए हैं। उनके निधन के समाचार से पूरी अयोध्या नगरी एक घने अंधकार और शोक के असीमित सागर में डूब जाती है। राजमहल के भीतर माता कौशल्या, माता सुमित्रा और अन्य रानियों का चीत्कार और विलाप देखकर किसी भी दर्शक की आंखें आंसुओं से नम हो जाती हैं। राजा दशरथ का निष्प्राण शरीर तब तक अंतिम संस्कार के लिए नहीं ले जाया जा सकता था, जब तक कि उनके किसी पुत्र द्वारा उन्हें मुखाग्नि न दी जाए। चूंकि श्री राम और लक्ष्मण वन में हैं, और भरत तथा शत्रुघ्न अपने ननिहाल कैकेय देश में हैं, ऐसे में कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ एक दूरदर्शी निर्णय लेते हैं। वे राजा दशरथ के शरीर को विशेष आयुर्वेदिक औषधियों और तेल के कड़ाह में सुरक्षित रखने का आदेश देते हैं, ताकि भरत के आने तक उनके शरीर में कोई विकार उत्पन्न न हो। भरत और शत्रुघ्न को तुरंत अयोध्या वापस बुलाने के लिए तीव्र गति वाले दूत भेजे जाते हैं। जब भरत वापस आते हैं और उन्हें अपनी माता कैकेयी से पूरी षड्यंत्रकारी घटना और पिता के निधन का पता चलता है, तो वे क्रोध और ग्लानि से भर उठते हैं। वे अपनी माता को कुलनाशिनी कहकर धिक्कारते हैं। इसके बाद भरत और शत्रुघ्न महर्षि वशिष्ठ और अन्य मंत्रियों के सानिध्य में अपने पिता के अंतिम दर्शन के लिए जाते हैं। पिता के निष्प्राण शरीर को देखकर दोनों भाई फूट-फूट कर रोते हैं। भरत को इस बात की गहरी आत्मग्लानि है कि उनके कारण और उनकी माता के स्वार्थ के चलते ही उनके महान पिता की यह दुर्दशा हुई है। इसके पश्चात महर्षि वशिष्ठ भरत को धैर्य बंधाते हैं और उन्हें एक पुत्र के रूप में अपने अंतिम संस्कारों और कर्तव्यों का निर्वहन करने का आदेश देते हैं। सरयू नदी के पावन तट पर राजा दशरथ की अंतिम यात्रा पूरे राजकीय सम्मान के साथ निकाली जाती है। पूरी अयोध्या नगरी अपने प्रिय महाराज को अंतिम विदाई देने के लिए सड़कों पर उमड़ पड़ती है। हर आंख नम है और हर हृदय भारी है। वैदिक मंत्रोच्चार और पूरे शास्त्रों के विधि-विधान के साथ राजा दशरथ की चंदन और घी की चिता सजाई जाती है। भरत और शत्रुघ्न भारी मन, कांपते हाथों और अश्रुपूर्ण नेत्रों से अपने पिता को मुखाग्नि देते हैं। यह दृश्य जीवन की नश्वरता और मृत्यु के अटल सत्य को बहुत ही गहराई से दर्शाता है। एक चक्रवर्ती सम्राट, जिसने कई महान युद्ध जीते, जिसे देवताओं का सानिध्य प्राप्त था, वह भी अंततः अपने प्रिय पुत्रों के वियोग में तड़प कर राख की ढेरी में मिल जाता है। यह एपिसोड राजधर्म, पुत्रधर्म और सांसारिक मोह-माया के दर्दनाक अंत का एक बहुत ही सजीव और भावुक चित्रण है।
Leave a Comment
Movie Details
Language
Hindi
Category
ramayan
Duration
Episode 22 (Full Episode)
Release Year
1987












