Ramayan EP 25 - जनक-वशिष्ठादि, राम-भरत-संवाद
Description
रामानंद सागर कृत 'रामायण' (1987) का पच्चीसवां (25वां) एपिसोड एक बहुत ही उच्च कोटि का दार्शनिक, नीतिगत और राजनैतिक संवाद प्रस्तुत करता है। यह एपिसोड इतिहास में 'राम-भरत संवाद' के रूप में विख्यात है, जहाँ एक ओर भरत का असीम भ्रातृ-प्रेम और भावुकता है, तो दूसरी ओर श्री राम का अपने पिता के वचनों और धर्म के प्रति अडिग और अटल संकल्प है। राजा दशरथ के निधन के पश्चात शोक में डूबे दोनों महान राजपरिवार (अयोध्या और जनकपुर) अब चित्रकूट के वन में एकत्रित हैं। राजा जनक, माता सुनयना और मिथिला के अन्य मंत्री भी इस दुःख की अत्यंत कठिन घड़ी में सांत्वना देने और अयोध्या के इस भयंकर संकट का समाधान निकालने के लिए चित्रकूट पहुंच चुके हैं। राजा जनक का आगमन इस प्रसंग में इसलिए भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि वे न केवल माता सीता के पिता हैं, बल्कि एक 'विदेह' (जीवन्मुक्त ज्ञानी) और महान दार्शनिक भी हैं, जिनकी न्यायपूर्ण बातों और ज्ञान को तीनों लोकों में आदर दिया जाता है。 चित्रकूट के शांत वातावरण में एक विशाल सभा का आयोजन होता है, जिसमें महर्षि वशिष्ठ, राजा जनक, तीनों माताएं और अयोध्या की प्रजा उपस्थित है। भरत हाथ जोड़कर और अश्रुपूर्ण नेत्रों से श्री राम के समक्ष अपना पक्ष रखते हैं। वे अत्यंत भावुक तर्कों के साथ कहते हैं कि राज्य के असली उत्तराधिकारी और योग्य राजा केवल श्री राम ही हैं। भरत बताते हैं कि माता कैकेयी द्वारा मांगे गए वरदान पापपूर्ण, स्वार्थ से भरे और अनुचित थे, इसलिए उनका पालन करना आवश्यक नहीं है। भरत श्री राम से हाथ जोड़कर मिन्नतें करते हैं कि वे अपना वनवास त्याग दें, अयोध्या लौट चलें और राजसिंहासन संभालें, क्योंकि उनके बिना अयोध्या पूरी तरह से अनाथ है। भरत यहाँ तक कह देते हैं कि यदि राम को अपने पिता का वचन निभाना ही है, तो उनके बदले वे स्वयं (भरत) 14 वर्ष का वनवास काट लेंगे, परंतु राम को अयोध्या लौटना ही होगा। परंतु मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम अत्यंत शांत, गंभीर, स्नेहपूर्ण और संतुलित वाणी में भरत को धर्म का वास्तविक पाठ पढ़ाते हैं। राम कहते हैं, "हे भरत! पिता का वचन हमारे लिए वेदवाक्य के समान है। यदि मैंने आज उनके वचन को तोड़ा या कोई मध्य मार्ग निकाला, तो आने वाले समय में संसार में कोई भी पुत्र अपने पिता की आज्ञा का पालन नहीं करेगा और सत्य तथा धर्म का हमेशा के लिए नाश हो जाएगा। रघुकुल की यह अनादि काल से रीति रही है कि प्राण भले ही चले जाएं, परंतु दिया गया वचन नहीं जाना चाहिए।" इस धर्म-संकट में गुरु वशिष्ठ और राजा जनक भी गहरे विचार में डूब जाते हैं। राजा जनक, जो न्याय के सर्वोच्च प्रतीक हैं, भरत के प्रेम और राम के धर्म दोनों की असीमित गहराई को भली-भांति समझते हैं। वे सभा में संबोधित करते हुए कहते हैं कि राम का धर्म अपनी जगह पूर्णतः सत्य है और भरत का निस्वार्थ प्रेम अपनी जगह सर्वोच्च है। जनक जी का यह संवाद अत्यंत मार्मिक है कि प्रेम और धर्म के इस युद्ध में दोनों ही पक्ष महान हैं। जब भरत का अपार प्रेम और माताओं के आंसू भी श्री राम को उनके संकल्प से डिगा नहीं पाते, तब यह तय होता है कि अंततः सत्य और धर्म की ही विजय होनी चाहिए। यह एपिसोड कूटनीति, पारिवारिक मूल्यों, व्यक्तिगत स्वार्थ के ऊपर त्याग और सत्य के पालन की ऐसी मिसाल पेश करता है जो पूरे विश्व साहित्य में अद्वितीय है। श्री राम का यह अडिग निर्णय उन्हें एक साधारण मनुष्य की सीमाओं से ऊपर उठाकर 'भगवान' और 'मर्यादा पुरुषोत्तम' की श्रेणी में सर्वदा के लिए स्थापित कर देता है।
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Movie Details
Language
Hindi
Category
ramayan
Duration
Episode 25 (Full Episode)
Release Year
1987












