Ramayan EP 26 - भरत का अयोध्या लौटना
Description
रामानंद सागर की 'रामायण' (1987) का छब्बीसवां (26वां) एपिसोड भरत के सर्वोच्च त्याग, वैराग्य, निष्ठा और समर्पण की वह अमर गाथा है, जो उन्हें इतिहास में एक अद्वितीय और महान भाई का दर्जा दिलाती है। चित्रकूट में श्री राम और भरत के बीच हुए लंबे और गहन संवाद तथा धर्म-चर्चा के बाद यह पूरी तरह से स्पष्ट हो जाता है कि श्री राम किसी भी परिस्थिति में अपने स्वर्गीय पिता राजा दशरथ के वचन को नहीं तोड़ेंगे और 14 वर्ष का वनवास पूर्ण करके ही अयोध्या की धरती पर वापस लौटेंगे। भरत, जो अपने बड़े भाई के बिना अयोध्या का राजसिंहासन स्वीकार करने के लिए कतई तैयार नहीं हैं, इस निर्णय से अत्यंत निराश और दुखी होते हैं। परंतु एक आदर्श और आज्ञाकारी भाई होने के नाते वे श्री राम की आज्ञा का उल्लंघन भी नहीं कर सकते。 इस भयंकर धर्म-संकट से बाहर निकलने और अयोध्या के राजकाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए भरत एक अत्यंत भावुक और अनोखा उपाय निकालते हैं। वे अश्रुपूर्ण नेत्रों से श्री राम से उनकी 'चरण-पादुकाएं' (लकड़ी की खड़ाऊं) मांगते हैं। भरत हाथ जोड़कर कहते हैं, "हे प्रभु! यदि आप अयोध्या नहीं लौट सकते, तो मुझे अपनी यह पवित्र चरण-पादुकाएं दे दीजिए। ये खड़ाऊं 14 वर्षों तक अयोध्या के सिंहासन पर विराजेंगी और मैं केवल आपके एक प्रतिनिधि, एक न्यासी (Trustee) और एक विनम्र सेवक (दास) के रूप में इस राज्य की देखभाल करूंगा।" श्री राम अपने भाई के इस असीम प्रेम को देखकर अत्यंत भावुक हो जाते हैं और वात्सल्य के साथ अपनी खड़ाऊं भरत को सौंप देते हैं। भरत उन खड़ाऊं को अपने सिर पर रखकर एक अत्यंत पवित्र धरोहर की भांति सम्मान देते हैं। इसके साथ ही भरत एक अत्यंत कठोर शर्त भी रखते हैं कि यदि 14 वर्ष की अवधि पूर्ण होने के बाद श्री राम एक दिन भी विलंब से अयोध्या लौटे, तो वे (भरत) धधकती हुई अग्नि में प्रवेश कर अपने प्राण त्याग देंगे। श्री राम उन्हें वचन देते हैं कि वे समय पर अवश्य लौटेंगे。 चित्रकूट से विदाई का यह दृश्य अत्यंत पीड़ादायक है। भरत, शत्रुघ्न, माताएं, राजा जनक और अयोध्यावासी भारी मन और आंसुओं के साथ चित्रकूट से वापस अयोध्या की ओर प्रस्थान करते हैं। जब भरत अयोध्या पहुंचते हैं, तो वे राजमहल में प्रवेश करने से साफ मना कर देते हैं। उनका मानना है कि जब उनके बड़े भाई वन में तपस्वियों का कठिन जीवन बिता रहे हैं, कंद-मूल खा रहे हैं और जमीन पर सो रहे हैं, तो वे राजमहल के मखमली बिस्तरों और स्वादिष्ट व्यंजनों का उपभोग कैसे कर सकते हैं? भरत अयोध्या नगर के पास स्थित 'नंदीग्राम' नामक एक छोटे से गांव में अपनी कुटिया बनाते हैं। वे भी राम की तरह वल्कल वस्त्र (पेड़ की छाल) धारण करते हैं, जटाएं रखते हैं और एक संन्यासी (तपस्वी) का जीवन अपना लेते हैं। वे श्री राम की खड़ाऊं को राजसिंहासन पर स्थापित करते हैं और प्रतिदिन राजकाज से जुड़ा कोई भी निर्णय लेने से पहले उन खड़ाऊं के समक्ष नतमस्तक होकर उनकी आज्ञा लेते हैं। यह एपिसोड एक सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर रहते हुए भी पूर्ण वैराग्य का एक ऐसा अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है, जिसकी कल्पना भी दुर्लभ है। भरत का यह चरित्र रामायण का वह स्वर्णिम पृष्ठ है, जो यह सिखाता है कि असली महानता सत्ता का उपभोग करने में नहीं, बल्कि अपनों के लिए सत्ता का त्याग करने में है। नंदीग्राम में भरत की यह 14 वर्षों की तपस्या श्री राम के वनवास से भी अधिक कठिन और महान मानी जाती है।
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Movie Details
Language
Hindi
Category
ramayan
Duration
Episode 26 (Full Episode)
Release Year
1987












