Ramayan EP 28 - राक्षस वध की प्रतिज्ञा करना
Description
रामानंद सागर की 'रामायण' (1987) का अट्ठाईसवां (28वां) एपिसोड एक बहुत ही गंभीर, ओजस्वी और धर्म की रक्षा के प्रति श्री राम के अटल संकल्प का अध्याय है। अत्रि मुनि के आश्रम से विदा लेकर और उनका आशीर्वाद प्राप्त कर श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण 'दंडकारण्य' (दंडक वन) के घने और भयानक जंगलों में प्रवेश करते हैं। यह वन अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए नहीं, बल्कि राक्षसों के खौफनाक आतंक, मायावी शक्तियों और उनके क्रूर कृत्यों के लिए जाना जाता है। यात्रा करते हुए जब वे वन की गहराई में आगे बढ़ते हैं, तो उन्हें एक स्थान पर अस्थियों (हड्डियों) और नरमुंडों (खोपड़ियों) का एक बहुत बड़ा और डरावना ढेर दिखाई देता है। वह अस्थियों का पहाड़ इतना विशाल है कि उसे देखकर माता सीता भी भयभीत हो जाती हैं। वहां का वातावरण अत्यंत खौफनाक और मनहूस प्रतीत होता है। जब श्री राम वहां उपस्थित कुछ डरे-सहमे तपस्वी ऋषि-मुनियों से इस अस्थि-पर्वत का रहस्य पूछते हैं, तो वे मुनि फूट-फूट कर रोते हुए बताते हैं कि ये उन हजारों निर्दोष और तपस्वी ऋषियों की अस्थियां हैं, जिन्हें निशाचरों (राक्षसों) ने उनकी तपस्या भंग करके बेरहमी से मार डाला और खा लिया। राक्षसों का आतंक इतना बढ़ गया है कि वन में कोई भी मुनि शांति से ईश्वर का ध्यान, यज्ञ या वैदिक अनुष्ठान नहीं कर सकता। यह हृदयविदारक सच्चाई सुनकर श्री राम का हृदय करुणा और भीषण क्रोध दोनों से भर उठता है। उनके नेत्र लाल हो जाते हैं। जो राम हमेशा शांत, सौम्य और मुस्कुराते हुए दिखाई देते हैं, आज उनका क्षत्रिय धर्म और संपूर्ण विश्व के रक्षक का रूप जाग उठता है। श्री राम अपने तरकश से बाण निकालते हैं, अपना कोदंड धनुष उठाते हैं, अपनी भुजाएं फड़काते हैं और वन के सभी ऋषियों के सामने एक अत्यंत कठोर और ऐतिहासिक प्रतिज्ञा लेते हैं—"निसिचर हीन करउं महि, भुज उठाइ पन कीन्ह" (मैं अपनी भुजा उठाकर यह प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं इस पूरी पृथ्वी को राक्षसों से मुक्त कर दूंगा, और धर्म की स्थापना करूंगा)। श्री राम की इस प्रतिज्ञा से पूरे ब्रह्मांड में एक नई ऊर्जा का संचार होता है और ऋषि-मुनियों को यह अटूट विश्वास हो जाता है कि अब उनके कष्टों का अंत निश्चित है। इसके पश्चात वे शरभंग मुनि और सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रमों में जाते हैं। शरभंग मुनि, जो केवल श्री राम के दर्शन के लिए ही अपने प्राणों को रोके हुए थे, राम के दर्शन कर स्वयं को योग अग्नि में भस्म कर लेते हैं और ब्रह्मलोक को प्राप्त होते हैं। सुतीक्ष्ण मुनि भी श्री राम की अपार भक्ति में लीन होकर उनका सत्कार करते हैं। यह एपिसोड यह सिद्ध करता है कि ईश्वर जब पृथ्वी पर अवतार लेते हैं, तो उनका मुख्य उद्देश्य दुष्टों का विनाश (विनाशाय च दुष्कृताम्) और साधु-संतों की रक्षा करना (परित्राणाय साधूनाम्) ही होता है।
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Movie Details
Language
Hindi
Category
ramayan
Duration
Episode 28 (Full Episode)
Release Year
1987












