Ramayan EP 33 - राम-लक्ष्मण सीता की खोज
Description
रामायण (1987) का तैंतीसवां (33वां) एपिसोड संपूर्ण रामायण के सबसे शोकपूर्ण, हृदयविदारक और करुणा से भरे प्रसंगों को प्रस्तुत करता है। लक्ष्मण के वन में जाने के पश्चात पंचवटी की कुटिया में माता सीता बिल्कुल अकेली हैं। इसी अवसर की ताक में छिपा बैठा लंकापति रावण एक अत्यंत ही कुटिल चाल चलता है। वह अपने दशानन और खूंखार रूप को छिपाकर एक शांत, तपस्वी और भिक्षुक (साधु) का रूप धारण करता है। रावण 'भवति भिक्षां देहि' पुकारते हुए कुटिया के द्वार पर आता है। माता सीता, जो भारतीय संस्कृति में अतिथि सत्कार को परम धर्म मानती हैं, उस भिक्षुक को अन्न और फल देने के लिए बाहर आती हैं। रावण जब लक्ष्मण रेखा के पास पहुंचता है, तो वह उस पवित्र रेखा की अग्नि और शक्ति को देखकर पीछे हट जाता है। वह समझ जाता है कि इस रेखा को पार करना उसके बस की बात नहीं है। इसलिए वह छल का सहारा लेते हुए क्रोधित होने का नाटक करता है और कहता है कि यदि सीता रेखा के बाहर आकर भिक्षा नहीं देंगी, तो वह उन्हें श्राप दे देगा। अपने कुल के संस्कारों और एक साधु के श्राप के भय से, माता सीता अनजाने में उस 'लक्ष्मण रेखा' को पार कर देती हैं। जैसे ही सीता रेखा के बाहर आती हैं, रावण अपना असली भयंकर और खूंखार रूप दिखा देता है। वह बलपूर्वक माता सीता को पकड़ लेता है और उन्हें अपने मायावी पुष्पक विमान (या रथ) में बैठाकर आकाश मार्ग से लंका की ओर उड़ चलता है। माता सीता का विलाप और "हा राम! हा लक्ष्मण!" की चीखें पूरे वन को रुला देती हैं। रास्ते में माता सीता की करुण पुकार सुनकर वृद्ध गिद्धराज जटायु, जो राजा दशरथ के मित्र थे, रावण को रोकते हैं। जटायु जानते हैं कि वे रावण जितने शक्तिशाली नहीं हैं, फिर भी एक स्त्री के सम्मान और अपने मित्र की पुत्रवधू की रक्षा के लिए वे रावण से एक भयंकर और खूनी युद्ध करते हैं। वे रावण के रथ को तोड़ देते हैं, लेकिन अंततः रावण अपनी तलवार से जटायु के दोनों पंख काट देता है और जटायु खून से लथपथ होकर जमीन पर गिर पड़ते हैं। यह जटायु का सर्वोच्च बलिदान है। इधर वन में, जब श्री राम और लक्ष्मण कुटिया में लौटते हैं और सीता को वहां नहीं पाते, तो उन पर मानों वज्र गिर पड़ता है। श्री राम का विलाप इतना मार्मिक है कि वह किसी भी दर्शक की आंखों में आंसू ला देता है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम, जो कभी विचलित नहीं होते, एक साधारण मनुष्य की भांति रोते-रोते वन के पेड़ों, पौधों, पशु-पक्षियों और लताओं से सीता का पता पूछते हैं—"हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी, तुम देखी सीता मृगनैनी?" राम का यह वियोग भगवान और उनके परम भक्त (सीता) के बीच के उस विशुद्ध प्रेम को दर्शाता है जो सीमाओं से परे है। खोजते हुए वे घायल जटायु के पास पहुंचते हैं, जो राम की गोद में प्राण त्यागते हुए बताते हैं कि दुष्ट रावण ही सीता को दक्षिण दिशा की ओर ले गया है। श्री राम एक पुत्र की भांति जटायु का अंतिम संस्कार करते हैं। यह एपिसोड प्रेम, वियोग और बलिदान की एक असीम गाथा है।
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Movie Details
Language
Hindi
Category
ramayan
Duration
Episode 33 (Full Episode)
Release Year
1987












