
Gulabo Sitabo (2020) - Comedy Drama Movie | Amitabh Bachchan | Ayushmann Khurrana | Full Movie HD
Gulabo Sitabo (2020) - Comedy Drama Movie | Amitabh Bachchan | Ayushmann Khurrana | Full Movie HD
Description
Gulabo Sitabo (2020) एक बेहद ही अनोखी, व्यंग्यात्मक (satirical) और स्लाइस-ऑफ-लाइफ कॉमेडी-ड्रामा फिल्म है, जो लखनऊ शहर की संकरी गलियों और नवाबी संस्कृति के बीच पनपते इंसानी लालच, स्वार्थ और रिश्तों की एक बहुत ही यथार्थवादी कहानी पेश करती है। इस फिल्म का निर्देशन शूजीत सरकार ने किया है और इसकी कहानी जूही चतुर्वेदी ने लिखी है। फिल्म का नाम कठपुतलियों के एक पारंपरिक खेल 'गुलाबो-सिताबो' से लिया गया है, जिसमें दो औरतें हमेशा आपस में लड़ती रहती हैं। बिल्कुल इसी तरह, इस फिल्म में भी दो मुख्य किरदार हैं जो एक-दूसरे के जानी दुश्मन हैं और दिन-रात एक पुरानी, जर्जर हवेली को लेकर झगड़ते रहते हैं। कहानी के केंद्र में है 'फातिमा महल' नाम की एक 100 साल पुरानी, विशाल लेकिन बेहद खस्ताहाल हवेली, जो लखनऊ के बीचों-बीच स्थित है। इस हवेली की असली मालकिन हैं 95 वर्षीय फातिमा बेगम (फर्रुख जफर), जो हवेली से भी ज्यादा पुरानी और रहस्यमयी लगती हैं। फातिमा बेगम का पति है 78 साल का चुन्नन 'मिर्ज़ा' नवाब (अमिताभ बच्चन), जो उम्र में अपनी पत्नी से 17 साल छोटा है। मिर्ज़ा एक बेहद लालची, कंजूस, चिड़चिड़ा और हमेशा झुका हुआ चलने वाला बूढ़ा आदमी है, जिसने फातिमा बेगम से शादी ही सिर्फ इस लालच में की थी कि एक दिन उसके मरने के बाद यह करोड़ों की हवेली उसके नाम हो जाएगी। लेकिन बेगम हैं कि मरने का नाम ही नहीं ले रही हैं। मिर्ज़ा का दिनभर का एक ही काम है—हवेली की रखवाली करना, उसमें से चोरी-छिपे छोटे-मोटे बल्ब या कबाड़ बेचकर पैसे कमाना, और अपने किरायेदारों से लड़ना। हवेली में कई पीढ़ियों से कुछ किरायेदार रहते आ रहे हैं, जो किराया मात्र 30 रुपये महीना देते हैं। इनमें से सबसे अड़ियल और मुंहफट किरायेदार है बांके रस्तोगी (आयुष्मान खुराना)। बांके एक गरीब चक्की वाला है, जिसके ऊपर अपनी तीन बहनों और माँ की जिम्मेदारी है। वह मिर्ज़ा से सख्त नफरत करता है और उसे महीनों तक वह 30 रुपये किराया भी नहीं देता। मिर्ज़ा और बांके के बीच हर दिन एक युद्ध होता है। मिर्ज़ा चाहता है कि बांके हवेली खाली कर दे, और बांके हवेली पर अपना पुश्तैनी हक जताता है। दोनों एक-दूसरे को नीचा दिखाने और परेशान करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ते—कभी बांके हवेली की दीवार तोड़ देता है, तो कभी मिर्ज़ा बांके के कमरे की बिजली और पानी काट देता है। कहानी में एक बड़ा और मजेदार ट्विस्ट तब आता है जब इस लड़ाई में दो नए किरदारों की एंट्री होती है। पहला है पुरातत्व विभाग (Archaeological Survey of India) का एक चालाक अफसर, ज्ञानेश शुक्ला (विजय राज)। ज्ञानेश बांके को भड़काता है कि यह हवेली एक ऐतिहासिक धरोहर है और अगर बांके सरकार की मदद से इसे हेरिटेज साइट घोषित करवा दे, तो सरकार मिर्ज़ा को बेदखल कर देगी और बांके को एक पक्का फ्लैट मिल जाएगा। बांके इस लालच में आ जाता है और ज्ञानेश के साथ मिलकर हवेली को सरकारी कब्जे में देने की साजिश रचने लगता है। दूसरी तरफ, जब मिर्ज़ा को इस बात की भनक लगती है, तो वह हवेली को बचाने के लिए एक लालची और शातिर स्थानीय वकील, क्रिस्टोफर क्लार्क (बृजेंद्र काला) के पास पहुंच जाता है। क्रिस्टोफर मिर्ज़ा को सलाह देता है कि इससे पहले कि सरकार हवेली पर कब्जा करे, वह इसे किसी बड़े बिल्डर को बेच दे। लेकिन समस्या यह है कि हवेली बेचने के लिए फातिमा बेगम के अंगूठे के निशान या उनके मरने का सर्टिफिकेट चाहिए। मिर्ज़ा बेगम के अंगूठे का निशान लेने की कई बेवकूफाना कोशिशें करता है, लेकिन बेगम अपनी उम्र के बावजूद मिर्ज़ा से ज्यादा चालाक हैं। अब हवेली को लेकर एक तरफ बांके और पुरातत्व विभाग हैं, तो दूसरी तरफ मिर्ज़ा और बिल्डर। हर कोई दूसरे को धोखा देने और करोड़ों की संपत्ति हड़पने के सपने देख रहा है। जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, लालच का यह खेल और भी उलझता जाता है। मिर्ज़ा और बांके अपने-अपने दांव खेलते हैं, और ऐसा लगने लगता है कि अंत में जो भी जीतेगा, उसे फातिमा महल मिल जाएगा। लेकिन फिल्म का क्लाइमैक्स पूरी तरह से अप्रत्याशित (unpredictable) और एक शानदार मास्टरस्ट्रोक है। क्लाइमैक्स में, जिस दिन हवेली की डील होने वाली होती है और पुरातत्व विभाग वाले हवेली पर कब्जा करने आते हैं, तभी पता चलता है कि फातिमा बेगम घर पर नहीं हैं। बेगम ने चुपचाप अपने एक पुराने प्रेमी (अब्दुल रहमान) के साथ भागने की योजना बना ली थी। सिर्फ इतना ही नहीं, बेगम ने हवेली को सिर्फ एक रुपये में अपने उसी पुराने प्रेमी के नाम कर दिया है और जाते-जाते हवेली के सारे कीमती सामान और कागजात अपने साथ ले गई हैं। अंत में मिर्ज़ा, बांके, वकील और पुरातत्व अफसर—सब के सब मुंह ताकते रह जाते हैं। फातिमा महल किसी का नहीं होता। मिर्ज़ा, जिसने हवेली के लालच में अपनी पूरी जवानी और जिंदगी एक बूढ़ी औरत की गुलामी में निकाल दी, अंत में सड़क पर आ जाता है। वहीं बांके और बाकी किरायेदारों को भी हवेली छोड़कर जाना पड़ता है। फिल्म का अंत एक बहुत ही गहरा दार्शनिक संदेश छोड़ता है कि इंसान भौतिक चीजों (materialistic things) के लालच में अपनी पूरी जिंदगी बर्बाद कर देता है, लेकिन अंत में ये चीजें किसी की सगी नहीं होतीं। 'Gulabo Sitabo' एक शानदार, हास्यपूर्ण और दिल को छू लेने वाली फिल्म है, जो अमिताभ बच्चन और आयुष्मान खुराना के बेहतरीन अभिनय और लखनऊ की देसी महक के लिए हमेशा याद की जाएगी।
Leave a Comment
Movie Details
Language
Hindi
Category
bollywood
Duration
2h 4m
Release Year
2020










