Ramayan EP 23 - भरत-शत्रुघ्न का वन गमन | भरत-निषाद मिलन
Description
रामानंद सागर की 'रामायण' (1987) का तेईसवां (23वां) एपिसोड भ्रातृ-प्रेम, सर्वोच्च पश्चाताप, वैराग्य और अपार भक्ति का एक अत्यंत ही भावुक और प्रेरणादायक प्रसंग है। राजा दशरथ के अंतिम संस्कार और सभी श्राद्ध कर्म पूर्ण होने के बाद, अयोध्या का राजसिंहासन सूना है। राज्य को बिना राजा के रखना शास्त्रों के अनुसार अनुचित है, इसलिए कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ और सभी प्रमुख मंत्री भरत से यह आग्रह करते हैं कि वे राजधर्म का पालन करते हुए अयोध्या का राज्याभिषेक स्वीकार करें और सिंहासन संभालें। लेकिन भरत, जिनके हृदय के कण-कण में अपने अग्रज श्री राम के प्रति अगाध प्रेम, श्रद्धा और भक्ति बसी हुई है, इस प्रस्ताव को सिरे से ठुकरा देते हैं। भरत अत्यंत भावुक होकर दृढ़ संकल्प लेते हैं कि अयोध्या का सिंहासन केवल और केवल श्री राम का है। वे प्रतिज्ञा करते हैं कि वे स्वयं वन जाकर अपने भाई के चरणों में गिरकर उनसे क्षमा मांगेंगे और उन्हें ससम्मान वापस अयोध्या लेकर आएंगे। भरत का यह विशाल त्याग और निस्वार्थ प्रेम देखकर महर्षि वशिष्ठ और पूरी अयोध्या प्रजा भावविभोर हो उठती है。 भरत और शत्रुघ्न के साथ तीनों माताएं (कौशल्या, कैकेयी, सुमित्रा), कुलगुरु वशिष्ठ और अयोध्या की विशाल प्रजा राम को वापस लाने के लिए वन की ओर एक विशाल यात्रा पर प्रस्थान करती है। भरत ने राजकीय रथ, आभूषण और सभी सुख-सुविधाओं का त्याग कर दिया है; वे नंगे पैर, सादे वस्त्रों में और एक कठोर तपस्वी की भांति वन की कठिन और पथरीली राहों पर चल रहे हैं। उनका मानना है कि जब उनके आराध्य बड़े भाई वन में कष्ट सह रहे हैं और नंगे पैर चल रहे हैं, तो एक छोटे भाई को रथ पर बैठकर जाने का या सुख भोगने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। यात्रा के दौरान, जब भरत की विशाल चतुरंगिणी सेना और प्रजा श्रृंगवेरपुर (निषादराज गुह के राज्य) की सीमा के पास पहुंचती है, तो निषादराज को दूर से उड़ती हुई धूल और सेना का कोलाहल देखकर गहरा संदेह होता है। निषादराज को लगता है कि कैकेयी का पुत्र भरत वन में अकेले श्री राम पर आक्रमण करने आ रहा है, ताकि वह निष्कंटक रूप से अयोध्या पर राज्य कर सके। राम की रक्षा के लिए निषादराज तुरंत अपने भील और कोल सैनिकों को युद्ध के लिए तैयार कर लेते हैं। लेकिन जब वे भरत के पास पहुंचते हैं और उन्हें नंगे पैर, तपस्वी वेश में और आंखों से आंसू बहाते हुए 'श्री राम' के नाम का स्मरण करते हुए देखते हैं, तो निषादराज का सारा क्रोध और संदेह क्षण भर में दूर हो जाता है। निषादराज दौड़कर भरत के चरणों में गिर पड़ते हैं। भरत उन्हें उठाकर अपने हृदय से लगा लेते हैं क्योंकि निषादराज श्री राम के परम मित्र और सखा हैं। निषादराज भरत को श्रृंगवेरपुर में वह पवित्र स्थान दिखाते हैं जहां श्री राम और माता सीता ने कुश (घास) की शैया पर अपनी रात बिताई थी। राम के सोने के उस कठोर स्थान को देखकर भरत फूट-फूट कर रोने लगते हैं। उनका हृदय विदीर्ण हो जाता है कि जिस सुकुमार राजकुमार को मखमली गद्दों पर सोना चाहिए था, उसे आज ऐसी कठोर जमीन पर सोना पड़ रहा है। यह भरत-निषाद मिलन जाति-पांति के भेदभाव से ऊपर उठकर केवल निस्वार्थ प्रेम, समर्पण और भक्ति की विजय को दर्शाता है। इस एपिसोड में भरत का चरित्र इतना महान और निर्मल दिखाया गया है कि वे भक्ति के मामले में श्री राम के समकक्ष खड़े नजर आते हैं। यह एपिसोड एक भाई के प्रति अगाध प्रेम और सच्ची आत्मग्लानि की सबसे पवित्र दास्तान है।
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Movie Details
Language
Hindi
Category
ramayan
Duration
Episode 23 (Full Episode)
Release Year
1987
