Ramayan EP 43 - हनुमान्जी का लंका को प्रस्थान
Description
रामायण (1987) का तैंतालीसवां (43वां) एपिसोड भारतीय महाकाव्य के सबसे ओजस्वी, प्रेरणादायक और रोंगटे खड़े कर देने वाले प्रसंगों में से एक है। यह एपिसोड हनुमान जी की भूली हुई शक्तियों के जागरण और उनके अकल्पनीय महापराक्रम को समर्पित है। स्वयंप्रभा की मदद से दक्षिण समुद्र के तट पर पहुँचने के बाद, वानर सेना एक अत्यंत गहरी निराशा में डूब जाती है। सुग्रीव द्वारा दिया गया एक महीने का समय समाप्त हो चुका है और उनके सामने ठाठें मारता हुआ सौ योजन (हजारों मील) चौड़ा असीम समुद्र खड़ा है। अंगद और अन्य वानर यह सोचकर समुद्र तट पर अनशन (भूख हड़ताल) करके प्राण त्यागने का निर्णय लेते हैं कि बिना सीता का पता लगाए लौटने पर सुग्रीव वैसे भी उन्हें मृत्युदंड दे देंगे। इसी निराशा के बीच, पहाड़ों के पीछे से एक अत्यंत विशालकाय और बूढ़ा गिद्ध बाहर आता है, जिसका नाम 'सम्पाती' है। सम्पाती असल में महान जटायु का बड़ा भाई है। शुरुआत में वह वानरों को अपना भोजन समझकर खुश होता है, लेकिन जब वानर विलाप करते हुए जटायु के महान बलिदान (सीता को बचाते हुए मृत्यु) की बात करते हैं, तो सम्पाती रो पड़ता है। सम्पाती की दृष्टि अत्यंत तेज (दूरदर्शी) है। वह समुद्र की ओर देखकर वानरों को बताता है कि सौ योजन दूर समुद्र के पार 'लंका' नाम की एक सोने की नगरी है, जहां राक्षसराज रावण ने माता सीता को अशोक वाटिका में बंदी बना रखा है। यह खुशखबरी सुनकर वानर सेना में एक नई आशा की लहर दौड़ जाती है। लेकिन अब सबसे बड़ा संकट यह है कि सौ योजन के इस विशाल समुद्र को लांघकर लंका जाएगा कौन? अंगद कहते हैं कि वे जा तो सकते हैं, लेकिन वापस आने का उनमें बल नहीं है। इस पूरी चर्चा के दौरान, श्री राम के परम भक्त हनुमान जी एक चट्टान पर चुपचाप और उदास बैठे हुए हैं। वे बचपन में मिले एक श्राप के कारण अपनी शक्तियों को पूरी तरह भूल चुके हैं। तब सबसे वयोवृद्ध और ज्ञानी मंत्री 'जाम्बवंत' आगे आते हैं और हनुमान जी के पास जाकर उन्हें उनके जन्म की कथा, उनकी महानता और उनकी अलौकिक शक्तियों का स्मरण कराते हैं। जाम्बवंत कहते हैं—"का चुप साधि रहेहु बलवाना! पवन तनय बल पवन समाना" (हे हनुमान! तुम चुप क्यों बैठे हो? तुम तो पवनदेव के पुत्र हो और तुम्हारा बल पवन के समान असीम है)। जाम्बवंत के इन प्रेरणादायक वचनों को सुनकर हनुमान जी के भीतर की सोई हुई शक्तियां ज्वालामुखि की तरह जाग उठती हैं। उनका शरीर एक विशाल पर्वत के समान बढ़ने लगता है। उनके रोम-रोंम से स्वर्ण के समान तेज निकलने लगता है और वे एक भयंकर सिंहनाद करते हैं जिससे पूरा समुद्र कांप उठता है। हनुमान जी कहते हैं कि वे एक ही छलांग में लंका पहुंचेंगे, रावण को मारकर सीता को ले आएंगे या पूरी लंका को ही उखाड़कर यहां ले आएंगे। जाम्बवंत उन्हें समझाते हैं कि उनका कार्य केवल सीता माता की खोज करना और उन्हें श्री राम का संदेश देना है। "जय श्री राम" के एक प्रचंड और गगनभेदी जयकारे के साथ हनुमान जी महेंद्र पर्वत से आकाश में एक महाकाय रॉकेट की तरह छलांग लगाते हैं। उनके उड़ने के वेग से पर्वत धंस जाता है और बड़े-बड़े पेड़ उखड़कर उनके पीछे आकाश में उड़ने लगते हैं। रास्ते में उनकी परीक्षा लेने के लिए 'सुरसा' नामक नागमाता आती हैं, जिसे हनुमान जी अपनी बुद्धि से हराते हैं। फिर 'सिंहिका' नाम की एक मायावी राक्षसी जो परछाई पकड़कर खा जाती है, हनुमान जी उसका वध कर देते हैं। मैनाक पर्वत उन्हें विश्राम करने का आग्रह करता है, लेकिन हनुमान जी यह कहकर आगे बढ़ जाते हैं कि "राम काज कीन्हें बिनु, मोहि कहाँ बिश्राम" (श्री राम का कार्य पूरा किए बिना मुझे विश्राम का कोई अधिकार नहीं है)। यह एपिसोड लक्ष्य प्राप्ति के लिए अटूट विश्वास, शक्ति के जागरण और भक्ति की एक असीम गाथा है।
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Movie Details
Language
Hindi
Category
ramayan
Duration
Episode 43 (Full Episode)
Release Year
1987
