Ramayan EP 57 - अंगद की चुनौती
Description
रामानंद सागर की 'रामायण' (1987) का सत्तावनवां (57वां) एपिसोड एक अत्यंत ओजस्वी, कूटनीतिक और रोंगटे खड़े कर देने वाला प्रसंग है, जो 'अंगद की चुनौती' (अंगद का पैर) के नाम से पूरे विश्व में विख्यात है। श्री राम के शांतिदूत बनकर लंकापति रावण के दरबार में पहुंचे बालि-पुत्र अंगद ने अपनी वाक्पटुता, निडरता और धर्म के ज्ञान से रावण के अहंकार को पहले ही गहरी चोट पहुंचा दी थी। रावण, जो खुद को त्रिलोक का सबसे शक्तिशाली और अजेय योद्धा मानता है, अंगद को केवल एक साधारण वानर समझकर उसका उपहास करता है। रावण कहता है कि राम और उसके वानरों की सेना लंका के वीर राक्षसों के सामने एक दिन भी नहीं टिक पाएगी। रावण के इस खोखले अहंकार को तोड़ने और उसे श्री राम की असीम शक्ति का आभास कराने के लिए, अंगद पूरी सभा के सामने एक अत्यंत ऐतिहासिक और अचंभित कर देने वाली चुनौती पेश करते हैं। अंगद भरी सभा के बीच अपना एक पैर (चरण) पूरी मजबूती से जमीन पर जमा देते हैं। वे एक सिंह की भांति दहाड़ते हुए लंका के सभी महारथियों, सेनापतियों और स्वयं रावण को ललकारते हैं—"हे रावण! यदि तुम्हारी इस पूरी सभा में कोई भी शूरवीर मेरे इस पैर को जमीन से थोड़ा सा भी हिला दे, तो मैं अपनी ओर से यह वचन देता हूँ कि श्री राम अपनी हार मान लेंगे, माता सीता को यहीं छोड़कर अयोध्या वापस लौट जाएंगे और तुम बिना युद्ध लड़े ही विजयी कहलाओगे।" यह खुली चुनौती सुनकर रावण के दरबार में सन्नाटा छा जाता है। लंका के बड़े-बड़े और अभिमानी राक्षस योद्धा, जिन्होंने देवताओं को भी युद्ध में धूल चटाई थी, इस छोटी सी चुनौती को अपने लिए अपमानजनक मानते हैं। वे हंसते हुए एक-एक करके अंगद का पैर हटाने के लिए आगे बढ़ते हैं। लंका के सबसे बलवान और खूंखार सेनापति अंगद के पैर को पकड़कर अपनी पूरी शक्ति लगाते हैं। वे पसीने से लथपथ हो जाते हैं, उनके दांत पीसने लगते हैं, लेकिन अंगद का पैर एक विशाल पर्वत (सुमेरु) की तरह अपनी जगह से तिल भर भी नहीं हिलता। कई राक्षस तो एक साथ मिलकर भी अंगद के पैर को हिलाने में पूरी तरह से विफल हो जाते हैं। पूरी सभा में हाहाकार मच जाता है। रावण का क्रोध सातवें आसमान पर पहुंच जाता है। अपने सभी योद्धाओं को इस तरह एक साधारण वानर के सामने हारते देखकर, अंततः रावण स्वयं अपने सिंहासन से उठता है। जैसे ही रावण अपने अहंकार में चूर होकर अंगद का पैर हटाने के लिए झुकता है और अंगद के चरण पकड़ने ही वाला होता है, अंगद अपना पैर पीछे खींच लेते हैं। रावण अचानक संतुलन खोकर जमीन पर गिर पड़ता है और उसका मुकुट लुढ़क जाता है। अंगद मुस्कुराते हुए रावण से कहते हैं—"अरे मूर्ख! तू मेरे पैर क्यों पकड़ रहा है? यदि तुझे अपने प्राण बचाने हैं और क्षमा ही मांगनी है, तो जाकर मेरे प्रभु श्री राम के चरण पकड़, जो साक्षात कृपानिधान हैं और वे तुझे अवश्य क्षमा कर देंगे।" रावण भरी सभा में अपने इस भयंकर अपमान से तिलमिला उठता है। यह एपिसोड अंगद की असीम भक्ति, उनके अकल्पनीय बाहुबल और लंका के अजेय होने के घमंड के चकनाचूर होने की वह शानदार दास्तान है जो हर दर्शक के हृदय में जोश भर देती है。
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Movie Details
Language
Hindi
Category
ramayan
Duration
Episode 57 (Full Episode)
Release Year
1987
