Ramayan EP 58 - मन्दोदरी का रावण को समझाना
Description
रामायण (1987) का अट्ठावनवां (58वां) एपिसोड लंका के राजमहल के भीतर चल रहे गहरे मानसिक द्वंद्व, अहंकार की पराकाष्ठा और एक पतिव्रता पत्नी के उस अंतिम प्रयास की कहानी है, जहाँ वह अपने पति को विनाश के मुंह में जाने से रोकना चाहती है। बालि-पुत्र अंगद लंका के दरबार में रावण के अहंकार को चकनाचूर करके और अपनी असीम शक्ति का प्रदर्शन करके सफलतापूर्वक श्री राम के शिविर में लौट चुके हैं। अंगद के लौटने के बाद यह बात पूरी तरह से स्पष्ट हो जाती है कि रावण किसी भी कीमत पर माता सीता को वापस नहीं लौटाएगा और अब शांति का कोई मार्ग नहीं बचा है। अब एक भयंकर और प्रलयंकारी युद्ध निश्चित है। इधर लंका के राजमहल में, रावण की पटरानी और एक अत्यंत बुद्धिमती तथा सती स्त्री, महारानी मंदोदरी, अपने महल में व्याकुल है। मंदोदरी ने जब अंगद की चुनौती और रावण के उस भयंकर अपमान के बारे में सुना, तो उसका हृदय किसी बहुत बड़े अपशकुन की आशंका से कांप उठा। मंदोदरी जानती है कि श्री राम कोई साधारण वनवासी या मनुष्य नहीं हैं। एक अकेला वानर (हनुमान) पूरी लंका को जलाकर राख कर गया, और दूसरे वानर (अंगद) का पैर लंका के बड़े-बड़े महारथी हिला भी नहीं सके—ये घटनाएं इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि राम की सेना अजेय है और उनके साथ साक्षात ईश्वर की शक्ति है। मंदोदरी अत्यंत भारी मन, अश्रुपूर्ण नेत्रों और हाथ जोड़कर रावण के शयनकक्ष में जाती है। वह रावण से वह ऐतिहासिक और नीतिपूर्ण संवाद करती है, जो 'मंदोदरी-रावण संवाद' के रूप में जाना जाता है। मंदोदरी रावण को उसके पिछले जीवन, उसके महान तप और उसके द्वारा देवताओं पर प्राप्त की गई विजय की याद दिलाती है। वह कहती है कि "हे स्वामी! आपका यश और आपका साम्राज्य तीनों लोकों में विख्यात है। आप इतने ज्ञानी होकर भी कामवासना और अहंकार के वशीभूत होकर क्यों अपनी बुद्धि भ्रष्ट कर रहे हैं? माता सीता कोई साधारण स्त्री नहीं, बल्कि साक्षात जगतजननी हैं, और वे लंका के लिए 'कालरात्रि' (विनाश की रात) बनकर आई हैं।" मंदोदरी रावण के पैरों में गिरकर मिन्नतें करती है कि वह अपने कुल, अपने पुत्रों और इस सोने की लंका को भस्म होने से बचा ले। वह रावण को सलाह देती है कि वह माता सीता को ससम्मान श्री राम के पास लौटा दे और उनसे क्षमा मांग ले। श्री राम अत्यंत दयालु हैं और वे रावण के सारे अपराध क्षमा कर देंगे। लेकिन रावण, जिसका विनाश अब उसके सिर पर सवार है (विनाश काले विपरीत बुद्धि), मंदोदरी की इन नीतिपूर्ण बातों को सुनकर जोर-जोर से हंसता है। रावण अपने अहंकार में कहता है कि "मैं दशानन रावण हूँ, जिसने मृत्यु को भी अपने पलंग के पाये से बांध रखा है। मुझे एक साधारण वनवासी और कुछ वानरों से डरने की आवश्यकता नहीं है।" रावण मंदोदरी को डरी हुई स्त्री कहकर उसकी बातों को सिरे से खारिज कर देता है। यह एपिसोड एक पतिव्रता पत्नी की उस विवशता को दर्शाता है जहाँ वह अपने आँखों के सामने अपने सुहाग और अपने पूरे परिवार को मौत के कुएं में कूदते हुए देखती है, लेकिन चाहकर भी कुछ नहीं कर पाती。
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Movie Details
Language
Hindi
Category
ramayan
Duration
Episode 58 (Full Episode)
Release Year
1987
