Ramayan EP 62 - कुम्भकर्ण का युद्ध प्रस्थान
Description
रामानंद सागर की 'रामायण' (1987) का बासठवां (62वां) एपिसोड धर्म, कर्त्तव्य, पारिवारिक निष्ठा और एक भाई के प्रति प्रेम का अत्यंत भावुक और वैचारिक रूप से गहरा प्रसंग है। पिछले एपिसोड में हमने देखा कि रावण के आदेश पर राक्षसों ने भारी मशक्कत और ढेर सारे भोजन-मदिरा के साथ विशालकाय कुम्भकर्ण को उसकी गहरी नींद से जगाया था। अब कुम्भकर्ण पूरी तरह से जाग चुका है और उसे रावण के दरबार में लाया गया है। जब रावण उसे बताता है कि उसने राम की पत्नी सीता का हरण कर लिया है और अब राम वानर सेना के साथ लंका पर चढ़ाई कर चुका है, तो कुम्भकर्ण की प्रतिक्रिया रावण की उम्मीदों से बिल्कुल विपरीत होती है。 कुम्भकर्ण केवल एक विशाल दानव नहीं है, बल्कि वह अत्यंत ज्ञानी और वेदों का ज्ञाता भी है। वह भरी सभा में अपने बड़े भाई रावण को उसके इस घोर पाप और कुकृत्य के लिए कड़ी फटकार लगाता है। कुम्भकर्ण कहता है, "हे भ्राता! आपने जगतजननी माता सीता का हरण करके अपने और पूरे राक्षस कुल के विनाश को स्वयं निमंत्रण दिया है। राम कोई साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि साक्षात नारायण के अवतार हैं, और उनके विरुद्ध युद्ध करना साक्षात काल के मुंह में जाने के समान है।" कुम्भकर्ण रावण को समझाता है कि अभी भी समय है, वह सीता को ससम्मान राम को लौटा दे और क्षमा मांग ले。 परंतु रावण, जिसका अहंकार उसकी बुद्धि को पूरी तरह नष्ट कर चुका है, कुम्भकर्ण की इस नेक सलाह को सुनकर अत्यंत क्रोधित हो जाता है। रावण कहता है कि उसने कुम्भकर्ण को उपदेश देने के लिए नहीं, बल्कि युद्ध करने के लिए जगाया है। यदि वह युद्ध नहीं करना चाहता, तो वापस जाकर सो जाए। रावण के इन कठोर वचनों को सुनकर कुम्भकर्ण को यह अहसास होता है कि उसके भाई का अंत अब निश्चित है और उसे कोई नहीं बचा सकता。 यहीं पर कुम्भकर्ण के चरित्र की सबसे बड़ी महानता और त्रासदी (Tragedy) सामने आती है। वह जानता है कि रावण अधर्म के मार्ग पर है और राम से युद्ध का मतलब निश्चित मृत्यु है। फिर भी, एक छोटे भाई के रूप में वह अपने कर्त्तव्य और अपने भाई के प्रति अपनी निष्ठा से पीछे नहीं हटता। वह कहता है, "हे भ्राता! आपने जो किया वह अधर्म है, लेकिन संकट की इस घड़ी में मैं आपका साथ नहीं छोड़ूंगा। मैं आपके लिए युद्ध भूमि में जाऊंगा और राम से लड़ूंगा।" युद्ध के लिए प्रस्थान करने से पहले कुम्भकर्ण मदिरा के घड़े पीता है और भयंकर हथियारों से लैस होकर लंका के मुख्य द्वार की ओर बढ़ता है। जब कुम्भकर्ण लंका से बाहर निकलता है, तो उसका विशाल और खौफनाक रूप देखकर वानर सेना में हाहाकार मच जाता है। उसके चलने से धरती कांपने लगती है और वानर डर के मारे इधर-उधर भागने लगते हैं। इसी बीच विभीषण भी कुम्भकर्ण से मिलने आते हैं। विभीषण कुम्भकर्ण के चरण स्पर्श करते हैं। कुम्भकर्ण विभीषण को आशीर्वाद देता है और कहता है कि उसने राम की शरण में जाकर बिल्कुल सही निर्णय लिया है, क्योंकि लंका में अब केवल विनाश बचा है। यह एपिसोड पारिवारिक कर्त्तव्य और नियति के आगे मनुष्य की विवशता का एक बहुत ही शानदार चित्रण है।
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Movie Details
Language
Hindi
Category
ramayan
Duration
Episode 62 (Full Episode)
Release Year
1987
