Ramayan EP 69 - हनुमान का द्रोणागिरी पर्वत उठा के लाना
Description
रामानंद सागर की 'रामायण' (1987) का उनहत्तरवां (69वां) एपिसोड भारतीय महाकाव्य के सबसे प्रसिद्ध, ओजस्वी और रोंगटे खड़े कर देने वाले प्रसंग—'हनुमान जी द्वारा संजीवनी बूटी लाना'—को अत्यंत भव्यता और रोमांच के साथ पर्दे पर जीवंत करता है। सुषेण वैद्य के निर्देशानुसार, यदि लक्ष्मण जी के प्राण बचाने हैं तो हिमालय के द्रोणागिरी पर्वत से सूर्योदय से पूर्व 'संजीवनी', 'विशल्यकरणी', 'सावर्ण्यकरणी' और 'संथानकरणी' नामक चार चमत्कारी जड़ी-बूटियां लानी होंगी। समय अत्यंत कम है और दूरी हजारों मील की है। श्री राम का आशीर्वाद लेकर हनुमान जी एक भयंकर सिंहनाद के साथ लंका से हिमालय की ओर आकाश मार्ग से उड़ चलते हैं। इधर लंका के राजमहल में, रावण के गुप्तचर उसे सूचना देते हैं कि राम का एक वानर (हनुमान) संजीवनी बूटी लेने हिमालय गया है। रावण जानता है कि यदि लक्ष्मण बच गए, तो लंका का विनाश निश्चित है। हनुमान जी को रोकने के लिए रावण अपने एक मायावी और कुटिल राक्षस 'कालनेमि' को भेजता है। कालनेमि हिमालय के मार्ग में एक सुंदर आश्रम बनाकर एक मायावी साधु का वेश धारण कर लेता है और हनुमान जी को रामकथा सुनाकर और विश्राम करने का लालच देकर फंसाने की कोशिश करता है। लेकिन हनुमान जी की भेंट एक मगरमच्छ (जो वास्तव में एक श्रापित अप्सरा थी) से होती है। हनुमान जी जब मगरमच्छ का वध करते हैं, तो वह अप्सरा श्राप से मुक्त हो जाती है और हनुमान जी को कालनेमि की असलियत बता देती है। इसके बाद हनुमान जी क्रोध में आकर कालनेमि को उसकी ही माया में उलझाकर उसका वध कर देते हैं और अपनी यात्रा जारी रखते हैं। जब हनुमान जी हिमालय के द्रोणागिरी पर्वत पर पहुँचते हैं, तो उनके सामने एक बहुत बड़ी दुविधा खड़ी हो जाती है। रात का अंधेरा है और पर्वत पर लाखों जड़ी-बूटियां चमक रही हैं। हनुमान जी उन चार विशेष जड़ी-बूटियों (संजीवनी आदि) को पहचानने में पूरी तरह से असमर्थ होते हैं। समय तेजी से बीत रहा है और सूर्योदय होने ही वाला है। यदि वे खाली हाथ लौटे तो उनके प्रभु राम के भाई लक्ष्मण के प्राण चले जाएंगे। इस भयंकर संकट और असमंजस की स्थिति में हनुमान जी एक ऐसा अकल्पनीय और ऐतिहासिक निर्णय लेते हैं, जिसने पूरे ब्रह्मांड को चकित कर दिया। हनुमान जी अपने शरीर को एक विशाल पर्वत के समान बढ़ा लेते हैं। वे "जय श्री राम" का गगनभेदी जयकारा लगाते हैं और अपनी विशाल भुजाओं से पूरे द्रोणागिरी पर्वत को ही उसकी जड़ों से उखाड़ लेते हैं। वे उस पूरे चमकते हुए पर्वत को अपने एक हाथ (हथेली) पर उठाते हैं और बिजली की गति से लंका की ओर वापस उड़ चलते हैं। रास्ते में जब हनुमान जी अयोध्या के ऊपर से गुजर रहे होते हैं, तो भरत उन्हें कोई राक्षस समझकर उन पर एक बिना फल (तीर) का बाण चला देते हैं। हनुमान जी "राम-राम" कहते हुए जमीन पर गिर पड़ते हैं। जब भरत को पता चलता है कि वे राम के दूत हैं और लक्ष्मण के प्राण संकट में हैं, तो भरत को गहरी आत्मग्लानि होती है। भरत हनुमान जी को अपने बाण पर बिठाकर लंका भेजने का प्रस्ताव रखते हैं, लेकिन हनुमान जी अपनी ही शक्ति से पुनः उड़ चलते हैं। ठीक सूर्योदय से कुछ क्षण पहले, जब श्री राम की उम्मीदें टूट रही होती हैं, हनुमान जी पूरे द्रोणागिरी पर्वत को लेकर लंका के शिविर में अवतरित होते हैं। यह दृश्य देखकर पूरी वानर सेना खुशी से पागल हो जाती है। सुषेण वैद्य तुरंत संजीवनी बूटी को पहचान कर उसका अर्क बनाते हैं और लक्ष्मण जी को पिलाते हैं। कुछ ही पलों में लक्ष्मण जी अपने सारे घावों से मुक्त होकर पूरी ऊर्जा के साथ उठ खड़े होते हैं। श्री राम दौड़कर लक्ष्मण को गले लगा लेते हैं। यह एपिसोड हनुमान जी की अपार शक्ति, उनकी अटूट भक्ति और उस अमिट प्रेम की गाथा है जो आज भी हर भारतीय के हृदय में बसती है。
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Movie Details
Language
Hindi
Category
ramayan
Duration
Episode 69 (Full Episode)
Release Year
1987
