Ramayan EP 71 - लक्ष्मण मेघनाद युद्ध और मेघनाद उद्धार
Description
रामानंद सागर की 'रामायण' (1987) का इकहत्तरवां (71वां) एपिसोड पूरे रामायण महाकाव्य के सबसे लंबे, सबसे हिंसक और सबसे निर्णायक युद्धों में से एक—'लक्ष्मण-मेघनाद अंतिम युद्ध'—को बहुत ही भव्यता और रोंगटे खड़े कर देने वाले एक्शन के साथ प्रस्तुत करता है। निकुम्भिला देवी का यज्ञ भंग होने के बाद मेघनाद (इंद्रजीत) का अहंकार और उसका क्रोध अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुका है। वह समझ चुका है कि अब छल और माया का समय समाप्त हो गया है। मेघनाद और लक्ष्मण एक-दूसरे के सामने रणभूमि में खड़े हैं। यह युद्ध केवल दो योद्धाओं का नहीं, बल्कि दो विचारधाराओं—सत्य और असत्य, धर्म और अधर्म—का परम टकराव है。 मेघनाद अपने पिता रावण से आशीर्वाद लेकर अपनी पूरी शक्ति के साथ लक्ष्मण पर टूट पड़ता है। दोनों योद्धा अत्यंत कुशल धनुर्धर हैं। आकाश में बाणों की ऐसी भयंकर वर्षा होती है कि सूर्य की रोशनी भी छिप जाती है। मेघनाद अपने अस्त्र-शस्त्रों से आग, बिजली और जहरीले नाग उत्पन्न करता है, लेकिन लक्ष्मण जी अपने शांत दिमाग और ईश्वरीय शक्तियों से उन सभी मायावी अस्त्रों को बीच में ही काट देते हैं। इस युद्ध में मेघनाद अपनी माया का अंतिम प्रयोग करते हुए कई बार अदृश्य होने का प्रयास करता है, लेकिन विभीषण लक्ष्मण का मार्गदर्शन करते हैं और मेघनाद की हर चाल को नाकाम कर देते हैं। अपने सगे चाचा विभीषण को शत्रुओं (राम-लक्ष्मण) का साथ देते देख मेघनाद आगबबूला हो जाता है। वह विभीषण को देशद्रोही और कुलकलंक कहकर धिक्कारता है और उन पर एक अत्यंत घातक 'यम-शक्ति' (या 'काल-शक्ति') चला देता है। यह शक्ति विभीषण के प्राण ले सकती थी, लेकिन लक्ष्मण जी अपनी जान पर खेलकर बीच में आ जाते हैं और उस शक्ति को अपने तीरों से काट देते हैं, जिससे विभीषण के प्राण बच जाते हैं। कई प्रहरों (घंटों) तक चलने वाले इस भयंकर युद्ध में दोनों ओर से बड़े-बड़े दिव्यास्त्रों—आग्नेयास्त्र, वरुणास्त्र, और ब्रह्मास्त्र—का प्रयोग होता है। जब लक्ष्मण को यह आभास हो जाता है कि मेघनाद को किसी भी साधारण अस्त्र से नहीं मारा जा सकता, और मेघनाद की शक्तियां क्षीण होने लगी हैं, तब वे अपने सबसे अमोघ और प्रलयंकारी बाण का संधान करते हैं। लक्ष्मण जी अपने धनुष की प्रत्यंचा को कान तक खींचते हैं और एक अत्यंत ऐतिहासिक और पवित्र संकल्प लेते हैं। वे पूरी सृष्टि को साक्षी मानकर घोषणा करते हैं—"हे बाण! यदि मेरे बड़े भाई श्री राम सत्यवादी हैं, यदि वे साक्षात धर्म के अवतार हैं, और यदि मैंने जीवन भर मन-वचन-कर्म से अपने भाई की निस्वार्थ सेवा की है, तो तुम इसी क्षण इस पापी मेघनाद का वध कर दो।" लक्ष्मण जी का यह संकल्प उनके चरित्र की पवित्रता और श्री राम के प्रति उनकी अगाध भक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण है। यह 'राम-बाण' एक प्रलयंकारी अग्नि की तरह आकाश को चीरता हुआ आगे बढ़ता है। मेघनाद इस बाण के तेज को देखकर समझ जाता है कि अब उसका अंत निश्चित है। वह बाण सीधे मेघनाद के गले पर जाकर लगता है और एक ही झटके में त्रिलोक-विजयी मेघनाद का सिर उसके धड़ से अलग कर देता है। मेघनाद का सिर और धड़ एक भयंकर गर्जना के साथ जमीन令 गिर पड़ते हैं। मेघनाद के वध के साथ ही पूरी लंका में हाहाकार मच जाता है, जबकि वानर सेना "जय श्री राम" और "लक्ष्मण जी की जय" के नारों से पूरा आसमान गुंजा देती है। देवता आकाश से पुष्प वर्षा करते हैं और लक्ष्मण जी की वंदना करते हैं। जब श्री राम को यह समाचार मिलता है, तो वे दौड़कर लक्ष्मण को गले लगा लेते हैं। यह एपिसोड बुराई के सबसे बड़े स्तंभ के पतन, सत्य की विजय और लक्ष्मण जी के उस असीम पराक्रम की गाथा है जिसने उन्हें इतिहास के सबसे महान योद्धाओं की श्रेणी में खड़ा कर दिया। इस युद्ध ने लंका के पतन पर अंतिम मुहर लगा दी है।
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Movie Details
Language
Hindi
Category
ramayan
Duration
Episode 71 (Full Episode)
Release Year
1987
