
Mahabharat EP 10 - द्रौपदी ने किया कर्ण को पति के रूप में अस्वीकार | महाभारत एक धर्म युद्ध
Mahabharat EP 10 - द्रौपदी ने किया कर्ण को पति के रूप में अस्वीकार | महाभारत एक धर्म युद्ध
Description
महाभारत का दसवां (10वां) एपिसोड भारतीय महाकाव्य के सबसे विवादास्पद, ऐतिहासिक और अपमानजनक क्षणों में से एक को पर्दे पर उतारता है—वह क्षण जिसने कुरुक्षेत्र के युद्ध की नींव में सबसे ज्यादा नफरत भर दी। द्रौपदी का स्वयंवर शुरू हो चुका है। पांचाल के सेनापति और द्रौपदी के भाई, धृष्टद्युम्न, सभा के मध्य में आकर स्वयंवर के अत्यंत कठोर नियम की घोषणा करते हैं—"जो भी शूरवीर इस दिव्य धनुष को उठाएगा, उस पर प्रत्यंचा (डोरी) चढ़ाएगा, और नीचे कड़ाह में उबलते हुए तेल में मछली की परछाई (Reflection) देखकर ऊपर घूमती हुई उस मछली की आंख को अपने बाण से भेदेगा, उसी के साथ मेरी बहन पांचाली का विवाह होगा।" एक-एक करके भारतवर्ष के बड़े-बड़े अभिमानी राजा और राजकुमार अपना भाग्य आजमाने के लिए मंच पर आते हैं। लेकिन यह कोई साधारण धनुष नहीं है; कई राजा तो इसे अपनी जगह से हिला तक नहीं पाते और मुंह के बल गिर पड़ते हैं। जो राजा धनुष उठा भी लेते हैं, वे उसकी प्रत्यंचा चढ़ाने के प्रयास में धनुष की झटके से घायल होकर अपमानित हो लौट जाते हैं। हस्तिनापुर के युवराज दुर्योधन और मद्र नरेश शल्य जैसे महान योद्धा भी इस प्रयास में पूरी तरह से विफल साबित होते हैं। महाराज द्रुपद को यह चिंता सताने लगती है कि क्या उनकी पुत्री आज अविवाहित ही रह जाएगी? तभी सभा में एक गजब का सन्नाटा छा जाता है। सूर्यपुत्र 'कर्ण' (अंगराज कर्ण) अपने आसन से उठकर मंच की ओर बढ़ते हैं। कर्ण की चाल में एक गजब का आत्मविश्वास और शेर जैसी ऊर्जा है। ब्राह्मणों की भीड़ में बैठे पांडव भी कर्ण को देखकर सतर्क हो जाते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि पूरे ब्रह्मांड में अर्जुन के बाद यदि कोई इस लक्ष्य को भेद सकता है, तो वह केवल और केवल कर्ण है। कर्ण बड़ी ही आसानी से उस भारी धनुष को उठा लेते हैं और बिना किसी प्रयास के उस पर प्रत्यंचा चढ़ा देते हैं। जैसे ही कर्ण बाण को धनुष पर रखकर नीचे तेल में परछाई देखने के लिए झुकते हैं और निशाना लगाने ही वाले होते हैं, पूरे दरबार की सांसें रुक जाती हैं। लेकिन ठीक उसी क्षण, जब बाण छूटने ही वाला होता है, राजकुमारी द्रौपदी अपने आसन से उठ खड़ी होती हैं और एक ऐसा ऐतिहासिक वाक्य बोलती हैं जिसकी गूंज युगों-युगों तक सुनाई देने वाली है। द्रौपदी भरी सभा में ऊंची और स्पष्ट आवाज में कहती हैं—"रुकिए! मैं एक 'सूतपुत्र' (रथ हांकने वाले के बेटे) से विवाह नहीं करूंगी।" यह एक वाक्य कर्ण के लिए किसी ब्रह्मास्त्र से भी ज्यादा घातक साबित होता है। कर्ण का निशाना चूकता नहीं, बल्कि उनका आत्मसम्मान और उनका हृदय एक झटके में चकनाचूर हो जाता है। पूरे दरबार में सन्नाटा छा जाता है। अपनी अपार शक्तियों और योग्यता के बावजूद, केवल अपनी जाति और कुल के कारण मिले इस भयंकर सार्वजनिक अपमान से कर्ण की आंखों में एक अजीब सा दर्द और नफरत भर आती है। कर्ण बिना कुछ कहे, अपना बाण वापस तरकश में रखते हैं, सूर्य की ओर देखते हैं और भारी मन से मंच से नीचे उतर आते हैं। यह एपिसोड सिर्फ एक स्वयंवर का दृश्य नहीं है; यह भारतीय समाज की उस गहरी जातिवादी सोच पर एक करारा प्रहार है जिसने कर्ण जैसे महान योद्धा को जीवन भर केवल अपमान ही दिया। द्रौपदी का यह अस्वीकार (Rejection) कर्ण के मन में द्रौपदी और पांडवों के प्रति एक ऐसी नफरत की आग पैदा कर देता है, जिसका परिणाम आगे चलकर चीरहरण और महाभारत के विनाशकारी युद्ध के रूप में सामने आएगा। इस ड्रामे के बाद, अब सभा में किसी के भी सफल होने की उम्मीद नहीं बचती, और मंच पूरी तरह से एक 'असली नायक' (अर्जुन) के उठने का इंतजार कर रहा होता है।
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Movie Details
Language
Hindi
Category
mahabharat
Duration
Episode 10
Release Year
1988











