
Mahabharat EP 12 - पांडवों के जीवित होने के समाचार मिला धृतराष्ट्र को | महाभारत एक धर्म युद्ध
Mahabharat EP 12 - पांडवों के जीवित होने के समाचार मिला धृतराष्ट्र को | महाभारत एक धर्म युद्ध
Description
महाभारत का बारहवां (12वां) एपिसोड रहस्यों के खुलने, राजनीतिक हलचल और हस्तिनापुर के राजदरबार में मचने वाले एक बड़े मनोवैज्ञानिक भूचाल की कहानी है। पांचाल नगरी में द्रौपदी स्वयंवर के दौरान ब्राह्मण के भेष में अर्जुन द्वारा मछली की आंख भेदने और भीम के पराक्रम को देखकर वहां उपस्थित दुर्योधन, कर्ण और शकुनि के मन में गहरे संदेह के बीज बो दिए गए थे। कर्ण को इस बात का दृढ़ विश्वास हो जाता है कि ऐसा अलौकिक धनुर्कौशल अर्जुन के अतिरिक्त किसी और का नहीं हो सकता, और जो ब्राह्मण पेड़ उखाड़कर लड़ रहा था, वह भीम ही हो सकता है। जब ये कौरव वापस हस्तिनापुर लौटते हैं, तो वे अपनी इस आशंका को लेकर शकुनि और दुर्योधन के साथ गुप्त मंत्रणा करते हैं। शकुनि का कुटिल दिमाग यह समझ जाता है कि लाक्षागृह की योजना पूरी तरह से विफल हो चुकी है और पांडव जीवित हैं। गुप्तचरों के माध्यम से जल्द ही यह खबर पूरे हस्तिनापुर में फैल जाती है कि पांचाल नरेश द्रुपद की पुत्री द्रौपदी का विवाह जिन पांच ब्राह्मणों से हुआ है, वे कोई और नहीं बल्कि कुंती पुत्र पांडव ही हैं। इतना ही नहीं, यह भी पता चलता है कि माता कुंती के एक अनजाने वचन ("जो भी लाए हो, पांचों भाई आपस में बांट लो") के कारण द्रौपदी अब पांचों पांडवों की पत्नी (पंचाली) बन चुकी है。 जब यह समाचार महाराज धृतराष्ट्र के कानों में पड़ता है, तो उनके चेहरे पर एक अजीब सा भावुक और कूटनीतिक द्वंद्व देखने को मिलता है। बाहर से, वे अपने भतीजों (पांडवों) के जीवित होने का समाचार सुनकर अत्यंत प्रसन्नता का नाटक करते हैं। वे पितामह भीष्म और महात्मा विदुर को बुलाकर कहते हैं कि "यह हमारे कुरुवंश के लिए बड़े ही सौभाग्य की बात है कि पांडु के पुत्र जीवित हैं और अब महाराज द्रुपद जैसे शक्तिशाली राजा उनके ससुर बन गए हैं।" लेकिन भीतर ही भीतर, धृतराष्ट्र का पुत्र-मोह उन्हें डरा रहा होता है। उन्हें पता है कि अब उनका पुत्र दुर्योधन कभी भी निष्कंटक रूप से हस्तिनापुर का राजा नहीं बन पाएगा। द्रुपद और श्री कृष्ण के समर्थन से पांडव अब पहले से भी कहीं अधिक शक्तिशाली हो चुके हैं。 दुर्योधन और शकुनि के लिए यह खबर किसी वज्रपात से कम नहीं है। दुर्योधन अपनी हताशा और क्रोध में अपने पिता धृतराष्ट्र के पास जाता है। वह शिकायत करता है कि पांडवों को किसी भी कीमत पर वापस हस्तिनापुर नहीं आने देना चाहिए, अन्यथा उसका राजसिंहासन छिन जाएगा। शकुनि दुर्योधन को उकसाता है कि वे पांडवों के बीच फूट डालने (द्रौपदी को लेकर) का प्रयास करें या द्रुपद को रिश्वत देकर पांडवों से अलग कर दें。 लेकिन पितामह भीष्म, गुरु द्रोण और महात्मा विदुर इस अवसर का उपयोग पांडवों को उनका उचित अधिकार दिलाने के लिए करते हैं। वे धृतराष्ट्र को समझाते हैं कि चूंकि पांडव जीवित हैं और युधिष्ठिर ही हस्तिनापुर के असली उत्तराधिकारी और युवराज हैं, इसलिए उन्हें ससम्मान वापस बुलाकर राज्य का भार सौंप देना चाहिए। विदुर धृतराष्ट्र को राजधर्म का स्मरण कराते हैं और चेतावनी देते हैं कि यदि अब पांडवों के साथ अन्याय हुआ, तो पांचाल की सेना और श्री कृष्ण हस्तिनापुर को नष्ट कर देंगे। यह एपिसोड कौरवों की हार की हताशा और पांडवों की एक नई, शक्तिशाली वापसी की मजबूत पृष्ठभूमि तैयार करता है।
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Movie Details
Language
Hindi
Category
mahabharat
Duration
Episode 12
Release Year
1988











