
Mahabharat EP 13 - श्री कृष्ण ने धृतराष्ट्र से माँगा पांडवों का अधिकार | महाभारत एक धर्म युद्ध
Mahabharat EP 13 - श्री कृष्ण ने धृतराष्ट्र से माँगा पांडवों का अधिकार | महाभारत एक धर्म युद्ध
Description
महाभारत का तेरहवां (13वां) एपिसोड कूटनीति, न्याय, अधिकारों की मांग और भगवान श्री कृष्ण के उस कूटनीतिक कौशल का बेहतरीन प्रदर्शन है, जो कुरुवंश के भविष्य की दिशा तय करने वाला है। पांडवों के जीवित होने और द्रौपदी के साथ उनके विवाह का समाचार जब पूरे आर्यावर्त में फैल जाता है, तो हस्तिनापुर के राजमहल में एक भारी राजनीतिक संकट पैदा हो जाता है। पितामह भीष्म, गुरु द्रोण और विदुर के अत्यधिक दबाव के बावजूद, महाराज धृतराष्ट्र अपने पुत्र-मोह के कारण पांडवों को उनका पुश्तैनी अधिकार (हस्तिनापुर का राजसिंहासन) वापस देने से हिचकिचा रहे हैं। इस गतिरोध को तोड़ने और पांडवों को न्याय दिलाने के लिए, साक्षात द्वारिकाधीश भगवान श्री कृष्ण और उनके बड़े भाई बलराम हस्तिनापुर के राजदरबार में पधारते हैं। श्री कृष्ण का हस्तिनापुर आना कौरवों के लिए एक बहुत बड़ा कूटनीतिक झटका है। जब श्री कृष्ण भरे दरबार में प्रवेश करते हैं, तो उनकी आभा, उनका तेज और उनकी मुस्कान के आगे बड़े-बड़े योद्धा भी नतमस्तक हो जाते हैं। श्री कृष्ण धृतराष्ट्र, भीष्म और पूरी सभा को संबोधित करते हुए एक अत्यंत तार्किक और नीतिपूर्ण संवाद करते हैं। वे कहते हैं, "महाराज! पांडु पुत्र न केवल जीवित हैं, बल्कि वे अब और भी अधिक शक्तिशाली और परिपक्व हो चुके हैं। वे हस्तिनापुर के वैध और धर्मसम्मत उत्तराधिकारी हैं। यह आपका राजधर्म है कि आप अपने भतीजों को ससम्मान वापस बुलाएं और युधिष्ठिर को वह सिंहासन सौंपें जो वास्तव में उसी का है।" दुर्योधन और शकुनि इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध करते हैं। दुर्योधन अहंकार में कहता है कि एक बार जो सत्ता उसके हाथों में आ गई है, उसे वह किसी भी कीमत पर वापस नहीं करेगा। शकुनि अपने कुटिल तर्कों से श्री कृष्ण की बातों को काटने की कोशिश करता है, लेकिन श्री कृष्ण अपनी वाक्पटुता (Eloquence) से शकुनि के हर तर्क को ध्वस्त कर देते हैं। श्री कृष्ण स्पष्ट चेतावनी देते हैं कि यदि पांडवों को उनका अधिकार नहीं मिला, तो यह कुरुवंश के लिए विनाशकारी सिद्ध होगा。 पितामह भीष्म और विदुर श्री कृष्ण का पूर्ण समर्थन करते हैं। धृतराष्ट्र एक भारी धर्म-संकट में फंस जाते हैं। एक ओर उनका अंधा पुत्र-मोह है जो दुर्योधन को राजा देखना चाहता है, और दूसरी ओर राजधर्म, भीष्म का दबाव और श्री कृष्ण की चेतावनी है। अंततः, भीष्म और विदुर एक मध्य-मार्ग (Middle Path) का प्रस्ताव रखते हैं। वे सुझाव देते हैं कि कुरु साम्राज्य का विभाजन (Partition) कर दिया जाए। आधा राज्य (हस्तिनापुर) दुर्योधन को दे दिया जाए और आधा राज्य पांडवों को दे दिया जाए, ताकि भविष्य में कोई युद्ध न हो。 धृतराष्ट्र इस विभाजन के प्रस्ताव को भारी मन से स्वीकार कर लेते हैं। वे महात्मा विदुर को आदेश देते हैं कि वे स्वयं पांचाल जाएं और पांडवों को माता कुंती और वधु द्रौपदी के साथ ससम्मान हस्तिनापुर वापस लेकर आएं। यह एपिसोड शांति की उम्मीद के साथ-साथ विभाजन के उस दर्द को भी दर्शाता है जो आगे चलकर खांडवप्रस्थ की बंजर भूमि के रूप में पांडवों को मिलने वाला है। श्री कृष्ण का यह कूटनीतिक कदम पांडवों के लिए उनके अपने राज्य की नींव रखता है।
Leave a Comment
Movie Details
Language
Hindi
Category
mahabharat
Duration
Episode 13
Release Year
1988











