Mahabharat EP 15 - खाण्डव वन बना इंद्रप्रस्थ | महाभारत एक धर्म युद्ध
Description
महाभारत का पंद्रहवां (15वां) एपिसोड निर्माण, चमत्कार और पांडवों के असीम वैभव के उत्कर्ष का एक बहुत ही शानदार और विजुअली भव्य (visually grand) अध्याय है। खांडवप्रस्थ की बंजर और डरावनी भूमि, जो कौरवों ने पांडवों को उनके विनाश की उम्मीद से दी थी, अब एक स्वर्ग में बदलने जा रही है। अर्जुन द्वारा जीवनदान पाए हुए दैत्यों के महान शिल्पी 'मयासुर' ने अपनी पूरी मायावी शक्तियों, जादुई कलाओं और असीम ज्ञान का उपयोग करके पांडवों के लिए एक नए नगर और राजमहल का निर्माण शुरू कर दिया है。 इस एपिसोड में मयासुर की वास्तुकला (Architecture) का वह जादू दिखाया गया है जो आज भी किंवदंतियों में अमर है। मयासुर रातों-रात पहाड़ों को काटकर, दिव्य मणियों और रत्नों से जड़कर एक ऐसा शहर बसा देता है जो सुंदरता में स्वर्ग को भी मात देता है। इस नए नगर का नाम देवराज इंद्र के नाम पर 'इंद्रप्रस्थ' (Indraprastha) रखा जाता है। इंद्रप्रस्थ का राजमहल (जिसे मयसभा कहा जाता है) कोई साधारण महल नहीं है; यह एक मायावी (Illusionary) महल है। इस महल की फर्श ऐसी बनाई गई है कि वह पानी की तरह दिखती है, और जहां असली पानी का कुंड है, वह बिल्कुल ठोस फर्श की तरह दिखता है। महल की दीवारें पारदर्शी स्फटिक (Crystal) से बनी हैं और दरवाजे अपने आप खुलते और बंद होते हैं। यह महल माया और वास्तविकता का एक ऐसा भ्रम पैदा करता है जो किसी को भी चकरा सकता है。 जब इंद्रप्रस्थ पूरी तरह से बनकर तैयार हो जाता है, तो उसकी भव्यता और सुंदरता की चर्चा पूरे आर्यावर्त में आग की तरह फैल जाती है। भगवान श्री कृष्ण और मुनिगण इंद्रप्रस्थ के इस नव-निर्माण की प्रशंसा करते हैं। युधिष्ठिर को इंद्रप्रस्थ के राजसिंहासन पर बैठाया जाता है। पांडव अपने पुरुषार्थ, न्याय और धर्म के बल पर इंद्रप्रस्थ को एक अत्यंत समृद्ध, खुशहाल और शक्तिशाली राज्य में बदल देते हैं। वहां की प्रजा इतनी सुखी है कि पूरे भारतवर्ष से लोग हस्तिनापुर छोड़कर इंद्रप्रस्थ में बसने के लिए आने लगते हैं。 यह खबर जब हस्तिनापुर में दुर्योधन और शकुनि तक पहुंचती है, तो उनकी रातों की नींद उड़ जाती है। जिस बंजर जमीन पर उन्होंने पांडवों की मौत की उम्मीद की थी, वहां एक ऐसा साम्राज्य खड़ा हो गया है जिसने हस्तिनापुर की चमक को भी फीका कर दिया है। दुर्योधन ईर्ष्या (Jealousy) की आग में जलने लगता है। वह इंद्रप्रस्थ और उसके मायावी महल को अपनी आंखों से देखने के लिए लालायित हो उठता है। यह एपिसोड पांडवों के जीवन के सबसे सुनहरे और सुखद दौर को दर्शाता है, लेकिन साथ ही यह उस भयंकर ईर्ष्या का भी बीज बोता है जो भविष्य में 'द्यूत क्रीड़ा' (चीरहरण और जुए) का कारण बनेगी, जब दुर्योधन मयसभा के भ्रम का शिकार होकर अपना सबसे बड़ा अपमान सहेगा। इंद्रप्रस्थ का निर्माण केवल एक शहर का निर्माण नहीं, बल्कि पांडवों के एक स्वतंत्र और शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में उभरने की कहानी है。
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Movie Details
Language
Hindi
Category
mahabharat
Duration
Episode 15
Release Year
1988












