Mahabharat EP 20 - श्री कृष्ण की अग्रपूजा और शिशुपाल का वध | महाभारत एक धर्म युद्ध
Mahabharat EP 20 - श्री कृष्ण की अग्रपूजा और शिशुपाल का वध | महाभारत एक धर्म युद्ध
Description
महाभारत का बीसवां (20वां) एपिसोड 'राजसूय यज्ञ', 'अग्रपूजा' के विवाद और अंततः 'शिशुपाल वध' जैसे महाकाव्य के सबसे नाटकीय, हिंसक और ऐतिहासिक प्रसंगों में से एक को प्रस्तुत करता है। इंद्रप्रस्थ की मायावी 'मयसभा' में राजसूय महायज्ञ का आयोजन हो रहा है। इस यज्ञ में भाग लेने के लिए पूरे भारतवर्ष से राजा, चक्रवर्ती सम्राट, ऋषि-मुनि और हस्तिनापुर से धृतराष्ट्र, भीष्म, विदुर और दुर्योधन सहित पूरा कुरु-परिवार पधारा है। यज्ञ की सबसे महत्वपूर्ण रस्म 'अग्रपूजा' (सबसे पहले सम्मान) की होती है। युधिष्ठिर पितामह भीष्म से पूछते हैं कि इस विशाल सभा में उपस्थित सभी महानुभावों में से सबसे पहले किसकी पूजा की जानी चाहिए? पितामह भीष्म, जो श्री कृष्ण के ईश्वरीय स्वरूप को भली-भांति जानते हैं, बिना किसी संकोच के यह घोषणा करते हैं कि इस पूरी सभा में द्वारिकाधीश भगवान श्री कृष्ण से अधिक ज्ञानी, शक्तिशाली और पूजनीय कोई नहीं है, अतः 'अग्रपूजा' श्री कृष्ण की ही होनी चाहिए। सभा के अधिकांश लोग इस प्रस्ताव का स्वागत करते हैं, लेकिन इसी बीच चेदि देश का राजा 'शिशुपाल' अपने आसन से उठ खड़ा होता है। शिशुपाल श्री कृष्ण की बुआ का बेटा है, लेकिन वह बचपन से ही कृष्ण से घोर ईर्ष्या और नफरत करता है। शिशुपाल भरी सभा में अग्रपूजा के इस निर्णय का कड़ा विरोध करता है। वह श्री कृष्ण का भयानक रूप से अपमान करना शुरू कर देता है। वह कृष्ण को एक ग्वाला, गायें चराने वाला, चोर और कायर कहकर संबोधित करता है। शिशुपाल के इन कटु वचनों को सुनकर भीम और अर्जुन क्रोध से आगबबूला हो जाते हैं और अपने हथियार निकाल लेते हैं। लेकिन श्री कृष्ण मुस्कुराते रहते हैं और उन्हें शांत रहने का इशारा करते हैं। दरअसल, शिशुपाल के जन्म के समय श्री कृष्ण ने उसकी माता (अपनी बुआ) को यह वचन दिया था कि वे शिशुपाल की सौ (100) गालियों (अपराधों) को क्षमा कर देंगे। श्री कृष्ण चुपचाप शिशुपाल की गालियों की गिनती करते रहते हैं। सभा में बैठे अन्य राजा भी इस तमाशे को देख रहे होते हैं। शिशुपाल अपने अहंकार और क्रोध में अंधा होकर सारी मर्यादाएं पार कर देता है। वह न केवल कृष्ण का, बल्कि भीष्म पितामह और पांडवों का भी अपमान करता है। जैसे ही शिशुपाल की 100 गालियां पूरी होती हैं, श्री कृष्ण का चेहरा गंभीर हो जाता है। वे शिशुपाल को चेतावनी देते हैं कि उसकी क्षमा की सीमा समाप्त हो चुकी है। लेकिन शिशुपाल अपनी 101वीं गाली दे डालता है। तब भगवान श्री कृष्ण का रौद्र रूप सामने आता है। वे अपनी उंगली उठाते हैं और उनका दिव्य 'सुदर्शन चक्र' उनके हाथ में प्रकट हो जाता है। सुदर्शन चक्र एक प्रचंड बिजली की तरह हवा में उड़ता है और पलक झपकते ही शिशुपाल का सिर धड़ से अलग कर देता है। शिशुपाल का कटा हुआ सिर जमीन पर गिरता है और पूरी सभा में खौफ और सन्नाटा छा जाता है। शिशुपाल का वध यह संदेश देता है कि भगवान की क्षमाशीलता को कभी उनकी कमजोरी नहीं समझना चाहिए। इस घटना के बाद राजसूय यज्ञ बिना किसी बाधा के संपन्न होता है और युधिष्ठिर चक्रवर्ती सम्राट बन जाते हैं।
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Movie Details
Language
Hindi
Category
mahabharat
Duration
Episode 20
Release Year
1988












