Mahabharat EP 32 - अर्जुन ने किया सुभद्रा का हरण | महाभारत एक धर्म युद्ध
Description
महाभारत का बत्तीसवां (32वां) एपिसोड प्रेम, बगावत और बलराम जी के भयंकर क्रोध के बीच श्री कृष्ण की मुस्कान की एक अत्यंत ही नाटकीय कहानी है। श्री कृष्ण की योजना के अनुसार, रैवतक पर्वत पर आयोजित एक बड़े उत्सव के दौरान जब सुभद्रा मंदिर में पूजा करने के लिए जाती हैं, तब अर्जुन अपने रथ के साथ वहां पहुँच जाते हैं। सुभद्रा खुशी-खुशी उस रथ पर सवार हो जाती हैं, और जैसा कि तय हुआ था, वे स्वयं रथ के घोड़ों की लगाम थाम लेती हैं। अर्जुन पीछे एक रक्षक की भांति खड़े हो जाते हैं और रथ द्वारिका की सीमाओं को पार करते हुए तेजी से आगे बढ़ने लगता है। जब द्वारिका के रक्षकों और यदुवंशियों को इस 'हरण' के बारे में पता चलता है, तो पूरे राज्य में हाहाकार मच जाता है। यह खबर दाऊ बलराम के कानों तक पहुँचती है। अपने ही अतिथि (अर्जुन) द्वारा अपनी बहन के इस प्रकार अपहरण किए जाने की बात सुनकर बलराम जी का क्रोध ज्वालामुखि की तरह फट पड़ता है। वे अपना अस्त्र 'हल' (Hala) उठा लेते हैं और पूरी 'नारायणी सेना' को अर्जुन का पीछा करने और उसे मृत्युदंड देने का आदेश देते हैं। तभी भगवान श्री कृष्ण अत्यंत शांत मुद्रा में बलराम जी के सामने आते हैं और उन्हें सोचने पर मजबूर करते हैं। वे कहते हैं, "दाऊ! तनिक विचार कीजिए और पता लगाइए कि वास्तव में हरण किसने किया है? रथ की लगाम तो हमारी बहन सुभद्रा के हाथों में थी, और अर्जुन तो पीछे बैठे थे। इसका तो सीधा सा अर्थ यही है कि एक वीर क्षत्राणी (सुभद्रा) ने अपने मनपसंद वर (अर्जुन) का हरण कर लिया है। इसमें अर्जुन का क्या दोष?" श्री कृष्ण के इस अकाट्य तर्क को सुनकर बलराम जी निरुत्तर हो जाते हैं। उनका क्रोध शांत हो जाता है और वे समझ जाते हैं कि यह सब उनके छोटे भाई की ही रची हुई लीला है। अंततः बलराम जी दुर्योधन को दिया अपना वचन वापस ले लेते हैं और अर्जुन-सुभद्रा के विवाह को सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं। दुर्योधन और शकुनि की चाल मिट्टी में मिल जाती है।
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Movie Details
Language
Hindi
Category
mahabharat
Duration
Episode 32
Release Year
1988












