Mahabharat EP 33 - कौरव पांडवों के बीच द्यूत क्रीड़ा | महाभारत एक धर्म युद्ध
Description
महाभारत का तैंतीसवां (33वां) एपिसोड संपूर्ण महाकाव्य के सबसे काले, विनाशकारी और ऐतिहासिक अध्याय की शुरुआत करता है—'द्यूत क्रीड़ा' (Game of Dice)। इंद्रप्रस्थ के भव्य निर्माण और राजसूय यज्ञ की अपार सफलता को देखकर हस्तिनापुर के युवराज दुर्योधन के सीने में ईर्ष्या (Jealousy) की ऐसी आग भड़क उठी है जो उसे दिन-रात जला रही है। वह पांडवों की संपत्ति, उनके सम्मान और उनके ऐश्वर्य को किसी भी कीमत पर छीनना चाहता है, लेकिन वह यह भी जानता है कि युद्ध के मैदान में अर्जुन और भीम को हराना असंभव है। इस हताशा को दूर करने के लिए उसका कुटिल मामा शकुनि एक बेहद ही खौफनाक साजिश रचता है। शकुनि दुर्योधन से कहता है कि जो काम तलवारें नहीं कर सकतीं, वह काम उसके पासे (Dice) कर सकते हैं। शकुनि महाराज धृतराष्ट्र को अपने जाल में फंसाकर पांडवों को हस्तिनापुर में एक 'मैत्रीपूर्ण' द्यूत क्रीड़ा (जुए के खेल) के लिए आमंत्रित करने को राजी कर लेता है। धृतराष्ट्र का पुत्र-मोह एक बार फिर राजधर्म पर भारी पड़ जाता है। धर्मराज युधिष्ठिर, जो बड़ों की आज्ञा टालना अपना अपमान समझते हैं और जिन्हें क्षत्रिय धर्म के अनुसार खेल की चुनौती स्वीकार करनी ही होती है, अपने भाइयों और द्रौपदी के साथ हस्तिनापुर पहुँचते हैं। हस्तिनापुर की राजसभा सज जाती है। एक तरफ दुर्योधन है, जिसकी ओर से उसके मामा शकुनि पासे फेंकने वाले हैं। शकुनि के पासे कोई साधारण पासे नहीं हैं; वे उसके मृत पिता की हड्डियों से बने हैं और केवल शकुनि के आदेश पर ही पलटते हैं। खेल शुरू होता है। शुरुआत में छोटी-छोटी बाज़ियां लगाई जाती हैं, लेकिन जल्द ही शकुनि अपने मायावी पासों से युधिष्ठिर को हार के जाल में फंसाना शुरू कर देता है। युधिष्ठिर के भीतर का जुआरी जाग उठता है। वे अपना खजाना, सोने-चांदी, रथ, हाथी और अंततः अपना पूरा इंद्रप्रस्थ राज्य हार जाते हैं। सभा में बैठे पितामह भीष्म, गुरु द्रोण और विदुर के चेहरों पर खौफ छाने लगता है। यह एपिसोड एक इंसान के विनाश की ओर बढ़ते अंधे कदमों का एक बहुत ही तनावपूर्ण दृश्य पेश करता है।
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Movie Details
Language
Hindi
Category
mahabharat
Duration
Episode 33
Release Year
1988












