Mahabharat EP 41 - पाण्डवों का वनवास हुआ पूर्ण | महाभारत एक धर्म युद्ध
Description
महाभारत का अड़तीसवां (38वां) एपिसोड पांडवों के कठिन जीवन के सबसे लंबे और दर्दनाक अध्याय के अंत की एक अत्यंत ही आनंदमय और रोमांचक कहानी है—'पांडवों का वनवास और अज्ञातवास पूर्ण होना'। द्यूत क्रीड़ा के समय तय की गई शर्तों के अनुसार, पांडवों को 12 वर्ष का कठोर वनवास और 1 वर्ष का अत्यंत गुप्त 'अज्ञातवास' (Incognito Exile) काटना था। यदि इस 13वें वर्ष के दौरान कौरवों ने उन्हें पहचान लिया, तो उन्हें पुनः 12 वर्ष के लिए वन जाना पड़ता। अपने इस एक वर्ष के अज्ञातवास को काटने के लिए पांडव भेष बदलकर मत्स्य देश के राजा 'विराट' के दरबार में अपनी सेवाएं दे रहे थे。 युधिष्ठिर 'कंक' नाम से राजा के सलाहकार बने थे, भीम 'वल्लभ' नाम का रसोइया बने थे, अर्जुन उर्वशी के श्राप का उपयोग कर 'बृहन्नला' नाम का एक नपुंसक नृत्य-शिक्षक बने थे (जो राजकुमारी उत्तरा को नृत्य सिखाते थे), नकुल 'ग्रंथिक' नाम से घोड़ों की देखभाल करते थे, सहदेव 'तंत्रीपाल' बनकर गायों की रक्षा करते थे, और महारानी द्रौपदी 'सैरंध्री' नाम की एक साधारण दासी बनकर महारानी सुदेष्णा की सेवा कर रही थीं। एक वर्ष तक दुनिया के सबसे महान सम्राटों ने इस अपमानजनक और दयनीय जीवन को बिना किसी शिकायत के जिया, ताकि वे धर्म और अपने वचनों का पालन कर सकें。 जब अज्ञातवास का 13वां वर्ष समाप्त होने वाला होता है, तो दुर्योधन के गुप्तचर चारों दिशाओं में पांडवों को ढूंढ रहे होते हैं। दुर्योधन को शक होता है कि पांडव विराट नगर में ही हैं। पांडवों को बाहर निकालने और उन्हें पहचानने के लिए, दुर्योधन, भीष्म, द्रोण, कर्ण और पूरी कौरव सेना राजा विराट के राज्य (मत्स्य देश) की गायों का अपहरण (गौ-हरण) करने के बहाने आक्रमण कर देती है। राजा विराट की सेना कमजोर पड़ जाती है और राजकुमार उत्तर घबराकर रणभूमि से भागने लगता है。 तब 'बृहन्नला' के भेष में अर्जुन राजकुमार उत्तर के सारथी बनते हैं। वे राजकुमार को शमी के पेड़ के पास ले जाते हैं, जहाँ उन्होंने अपने असली हथियार (गांडीव आदि) छिपा कर रखे थे। ठीक उसी समय (अंतिम दिन की दोपहर में) उनका एक वर्ष का अज्ञातवास आधिकारिक रूप से पूर्ण हो जाता है। अर्जुन अपना गांडीव धनुष उठाते हैं, अपने असली क्षत्रिय रूप में आते हैं और कौरव सेना पर टूट पड़ते हैं। अकेले अर्जुन अपने बाणों की वर्षा से भीष्म, द्रोण, कर्ण और दुर्योधन सहित पूरी कौरव सेना को धूल चटा देते हैं और उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर देते हैं。 जब कौरव हारकर लौट रहे होते हैं, तब दुर्योधन दावा करता है कि उसने अर्जुन को अज्ञातवास समाप्त होने से पहले ही पहचान लिया है। लेकिन पितामह भीष्म पंचांग (Calendar) और समय की गणना करके स्पष्ट करते हैं कि अर्जुन के धनुष उठाने से पहले ही 13वां वर्ष पूर्ण रूप से समाप्त हो चुका था। युद्ध जीतकर जब अर्जुन वापस विराट नगर लौटते हैं, तो पांचों पांडव और द्रौपदी राजा विराट के सामने अपने असली और तेजस्वी रूप में प्रस्तुत होते हैं। राजा विराट यह जानकर आश्चर्यचकित रह जाते हैं कि जिन लोगों को वे साधारण सेवक मानते थे, वे असल में भारतवर्ष के सबसे महान सम्राट और महारानी हैं। अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए राजा विराट अपनी पुत्री उत्तरा का विवाह अर्जुन से करने का प्रस्ताव रखते हैं, लेकिन अर्जुन उत्तरा को अपनी शिष्या मानते हुए उसे अपने पुत्र 'अभिमन्यु' के लिए स्वीकार कर लेते हैं। यह एपिसोड न्याय, धैर्य और 13 वर्षों के अंधकार के बाद एक नई सुबह के उदय का बहुत ही शानदार चित्रण है।
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Movie Details
Language
Hindi
Category
mahabharat
Duration
Episode 41
Release Year
1988












