Mahabharat EP 42 - पाण्डवों ने दुर्योधन से माँगा अपना राज्य वापस | महाभारत एक धर्म युद्ध

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Mahabharat EP 42 - पाण्डवों ने दुर्योधन से माँगा अपना राज्य वापस | महाभारत एक धर्म युद्ध

9.5
Episode 42
1988
HDMythologyDramaHistory

Description

महाभारत का उनतालीसवां (39वां) एपिसोड शांति, कूटनीति, अधिकारों की मांग और एक टलते हुए महाविनाश की पृष्ठभूमि का अत्यंत ही तनावपूर्ण और राजनीतिक अध्याय है। 12 वर्षों के वनवास और 1 वर्ष के अज्ञातवास की कठोर शर्तों को सफलतापूर्वक और धर्मपूर्वक पूरा करने के बाद, अब पांडव अपने पूर्व गौरव और अपने राज्य (इंद्रप्रस्थ) को वापस पाने के वैध अधिकारी बन चुके हैं। विराट नगर में राजकुमारी उत्तरा और अभिमन्यु के विवाह के अवसर पर भारतवर्ष के कई बड़े राजा—द्रुपद, कृष्ण, बलराम और अन्य मित्र—एकजुट होते हैं और आगे की रणनीति पर विचार करते हैं。 धर्मराज युधिष्ठिर, जो कभी युद्ध नहीं चाहते और शांति के पक्षधर हैं, यह निर्णय लेते हैं कि कौरवों पर तुरंत आक्रमण करने के बजाय, पहले शांति और कूटनीति का मार्ग अपनाया जाए। भगवान श्री कृष्ण भी इस बात का समर्थन करते हैं कि युद्ध हमेशा अंतिम विकल्प होना चाहिए। इस उद्देश्य से, राजा द्रुपद के एक अत्यंत विद्वान और वयोवृद्ध पुरोहित (ब्राह्मण दूत) को शांतिदूत बनाकर हस्तिनापुर के राजदरबार में भेजा जाता है。 हस्तिनापुर के भव्य दरबार में महाराज धृतराष्ट्र, पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य, महात्मा विदुर, दुर्योधन, कर्ण और शकुनि उपस्थित हैं। पांडवों का दूत भरी सभा में खड़ा होकर अत्यंत स्पष्ट और नीतिपूर्ण शब्दों में कहता है—"महाराज! पांडवों ने द्यूत क्रीड़ा की सभी कठोर शर्तों को पूरी ईमानदारी के साथ 13 वर्षों तक निभाया है। अब समय आ गया है कि आप अपने वादे के अनुसार उन्हें उनका राज्य (इंद्रप्रस्थ) ससम्मान वापस लौटा दें। यदि आप ऐसा करते हैं, तो पांडव आपके अधीन रहकर शांति से जीवन व्यतीत करेंगे और इस कुरुवंश में कभी खून-खराबा नहीं होगा।" यह प्रस्ताव सुनकर पितामह भीष्म, गुरु द्रोण और विदुर अत्यंत प्रसन्न होते हैं। वे सभी एक स्वर में महाराज धृतराष्ट्र को सलाह देते हैं कि दूत का प्रस्ताव न्यायोचित है। भीष्म चेतावनी देते हैं कि अर्जुन और भीम का सामना करना कौरवों के लिए विनाशकारी होगा, इसलिए चुपचाप पांडवों को उनका आधा राज्य लौटा देना चाहिए。 लेकिन सत्ता, लालच और अहंकार में पूरी तरह से अंधा हो चुका दुर्योधन इस प्रस्ताव को सुनकर आगबबूला हो जाता है। वह भरी सभा में अपने बड़ों का अपमान करते हुए चिल्लाता है कि पांडवों को कोई राज्य नहीं मिलेगा। दुर्योधन झूठा तर्क देता है कि उसने अर्जुन को अज्ञातवास के दौरान ही पहचान लिया था, इसलिए पांडवों को वापस 12 साल के वनवास पर जाना होगा। लेकिन भीष्म उसे चुप कराते हुए कहते हैं कि पंचांग के अनुसार समय पूरा हो चुका था। दुर्योधन अपनी जिद्द पर अड़ा रहता है। वह कहता है कि द्यूत क्रीड़ा में जो कुछ जीता गया था, वह अब उसका है। शकुनि और कर्ण भी दुर्योधन के इस अहंकार को हवा देते हैं। महाराज धृतराष्ट्र, जो हमेशा की तरह अपने पुत्र-मोह में विवश हैं, कोई भी स्पष्ट निर्णय लेने से कतराते हैं। वे कहते हैं कि वे विचार करके अपना दूत पांडवों के पास भेजेंगे। यह एपिसोड दिखाता है कि कैसे एक इंसान का अहंकार और सत्ता का लालच पूरे वंश को एक महाविनाशकारी युद्ध की ओर धकेल रहा है। दर्शकों को यहाँ साफ तौर पर दिखने लगता है कि अब 'शांति' का शब्द हस्तिनापुर के शब्दकोश से हमेशा के लिए मिटने वाला है।

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Movie Details

Language

Hindi

Category

mahabharat

Duration

Episode 42

Release Year

1988

Mahabharat EP 42 - पाण्डवों ने दुर्योधन से माँगा अपना राज्य वापस | महाभारत एक धर्म युद्ध
HD
9.5

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