Mahabharat EP 43 - दुर्योधन ने पाण्डवों को उनकी नगरी लौटने से किया माना | महाभारत एक धर्म युद्ध
Mahabharat EP 43 - दुर्योधन ने पाण्डवों को उनकी नगरी लौटने से किया माना | महाभारत एक धर्म युद्ध
Description
महाभारत का चालीसवां (40वां) एपिसोड 'युद्ध की अनिवार्यता' (Inevitability of War) और दुर्योधन के उस चरम अहंकार को प्रस्तुत करता है, जो संपूर्ण कुरुवंश के विनाश की नींव पर अंतिम मुहर लगा देता है। पांडवों के शांति प्रस्ताव के जवाब में, महाराज धृतराष्ट्र अपने सारथी 'संजय' को एक दूत के रूप में पांडवों के शिविर (उपप्लव्य) में भेजते हैं। लेकिन धृतराष्ट्र अपने पुत्र-मोह के कारण संजय को कोई स्पष्ट प्रस्ताव देकर नहीं भेजते। वे संजय के माध्यम से केवल यह संदेश भिजवाते हैं कि पांडवों को धर्म का पालन करते हुए युद्ध नहीं करना चाहिए और शांति बनाए रखनी चाहिए, लेकिन राज्य लौटाने का कोई जिक्र नहीं करते。 जब संजय पांडवों के पास पहुँचकर यह गोलमोल बात कहते हैं, तो युधिष्ठिर और श्री कृष्ण समझ जाते हैं कि धृतराष्ट्र और दुर्योधन राज्य वापस देने के मूड में नहीं हैं। युधिष्ठिर, जो रक्तपात से सबसे अधिक डरते हैं, शांति बनाए रखने के लिए एक अत्यंत ही न्यूनतम और ऐतिहासिक समझौता (Compromise) पेश करते हैं। युधिष्ठिर कहते हैं, "हे संजय! जाकर महाराज और दुर्योधन से कहो कि यदि वे हमें हमारा पूरा इंद्रप्रस्थ राज्य नहीं देना चाहते, तो न दें। हम पांच भाई केवल 'पांच गांव' (Five Villages) लेकर ही संतोष कर लेंगे। हमें केवल पांच गांव दे दो, बाकी पूरा भारतवर्ष दुर्योधन खुशी-खुशी अपने पास रखे। हम युद्ध नहीं करेंगे।" जब संजय यह प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर लौटते हैं और भरी सभा में युधिष्ठिर की इस महानता और शांति की अपील को सुनाते हैं, तो भीष्म, द्रोण और विदुर को लगता है कि अब यह विवाद आसानी से सुलझ जाएगा। पांच गांव देना किसी भी राजा के लिए कोई बड़ी बात नहीं है। वे दुर्योधन को समझाते हैं कि इससे अच्छा सौदा उसे नहीं मिल सकता। लेकिन दुर्योधन का अहंकार और पांडवों के प्रति उसकी नफरत इस कदर हावी है कि वह इंसानियत की सारी हदें पार कर जाता है। वह भरी सभा में एक ऐसा अड़ियल और खौफनाक बयान देता है, जिसने महाभारत के युद्ध को 100 प्रतिशत सुनिश्चित कर दिया। दुर्योधन गरजते हुए कहता है—"पांच गांव तो बहुत दूर की बात है, मैं उन्हें एक सुई की नोंक के बराबर (सूच्यग्रं नैव दास्यामि) जमीन भी बिना युद्ध के नहीं दूंगा। यदि पांडवों को कुछ चाहिए, तो उन्हें अपने हथियार उठाकर कुरुक्षेत्र के मैदान में आना होगा।" दुर्योधन का यह हठ (Stubbornness) सुनकर सभा में सन्नाटा छा जाता है। पितामह भीष्म अपनी आंखें बंद कर लेते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि दुर्योधन ने आज स्वयं अपने और अपने 99 भाइयों के मृत्यु-पत्र (Death Warrant) पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। विदुर चेतावनी देते हैं कि दुर्योधन का यह अहंकार हस्तिनापुर को श्मशान बना देगा, लेकिन दुर्योधन किसी की नहीं सुनता。 इधर, जब यह खबर पांडवों तक पहुँचती है, तो भीम और अर्जुन का खून खौल उठता है। युधिष्ठिर को भी यह अहसास हो जाता है कि जब सुई की नोंक जितनी जमीन भी शांति से नहीं मिल सकती, तो अब 'धर्मयुद्ध' के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। यह एपिसोड एक बहुत बड़ा सबक है कि जब लालच और अहंकार मनुष्य की बुद्धि को हर लेता है, तो विनाश सबसे पहले उसी के दरवाजे पर दस्तक देता है। अब दोनों पक्ष युद्ध की तैयारियों में जुट जाते हैं, और कुरुक्षेत्र की भूमि खून पीने के लिए तैयार होने लगती है।
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Movie Details
Language
Hindi
Category
mahabharat
Duration
Episode 43
Release Year
1988












