Mahabharat EP 44 - श्री कृष्ण पांडवों के दूत बनकर पहुँचे धृतराष्ट्र की सभा में | महाभारत एक धर्म युद्ध

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Mahabharat EP 44 - श्री कृष्ण पांडवों के दूत बनकर पहुँचे धृतराष्ट्र की सभा में | महाभारत एक धर्म युद्ध

9.5
Episode 44
1988
HDMythologyDramaHistory

Description

महाभारत का इकतालीसवां (41वां) एपिसोड कूटनीति, शांति के अंतिम प्रयास और भगवान श्री कृष्ण की उस महान भूमिका को दर्शाता है जहाँ वे स्वयं साक्षात शांतिदूत (Messenger of Peace) बनकर हस्तिनापुर जाते हैं। दुर्योधन द्वारा पांडवों को 'सुई की नोंक के बराबर' भी जमीन देने से इनकार करने के बाद, युद्ध लगभग तय हो चुका है। लेकिन श्री कृष्ण, जो जानते हैं कि युद्ध का अर्थ लाखों निर्दोष महिलाओं का विधवा होना और कुरुवंश का समूल नाश है, युद्ध टालने का अंतिम प्रयास करना चाहते हैं। पांडव और द्रौपदी श्री कृष्ण के इस निर्णय से आशंकित हैं। द्रौपदी विशेष रूप से अपने खुले हुए केश (बाल) दिखाकर श्री कृष्ण को अपने अपमान की याद दिलाती हैं। श्री कृष्ण द्रौपदी को आश्वस्त करते हैं कि यदि कौरवों ने शांति प्रस्ताव नहीं माना, तो कौरव स्त्रियों को भी इसी तरह रोना पड़ेगा। शांतिदूत बनकर श्री कृष्ण जब अपने रथ पर सवार होकर हस्तिनापुर की ओर निकलते हैं, तो उनकी आभा और उनका तेज देखने लायक होता है। दुर्योधन को जब पता चलता है कि श्री कृष्ण आ रहे हैं, तो वह एक कुटिल चाल चलता है। वह श्री कृष्ण को अपनी ओर मिलाने के लिए रास्ते में कई भव्य शिविर, मनोरंजन और 'छप्पन भोग' (56 व्यंजनों का शाही भोजन) की व्यवस्था करवाता है। लेकिन श्री कृष्ण दुर्योधन के इन सभी प्रलोभनों को पूरी तरह से ठुकरा देते हैं। हस्तिनापुर पहुँचने पर, श्री कृष्ण दुर्योधन के राजमहल में ठहरने और उसका राजसी भोजन खाने से साफ इनकार कर देते हैं। वे कहते हैं कि भोजन या तो भूख लगने पर खाया जाता है या प्रेम होने पर; और दुर्योधन के हृदय में प्रेम नहीं, केवल अहंकार है। श्री कृष्ण इसके बजाय अपने परम भक्त और धर्मपरायण काका 'विदुर' के छोटे से घर में जाकर ठहरते हैं और विदुरानी (विदुर की पत्नी) के हाथों से प्रेमपूर्वक परोसा गया सादा 'साग' (सब्जी) और छिलके बड़े चाव से ग्रहण करते हैं। यह दृश्य भक्त और भगवान के बीच के निस्वार्थ प्रेम का एक अत्यंत सुंदर और दार्शनिक चित्रण है। अगले दिन, श्री कृष्ण पूरे राजसी सम्मान के साथ हस्तिनापुर की राजसभा में प्रवेश करते हैं। उनका ओजस्वी रूप देखकर पूरी सभा उनके सम्मान में खड़ी हो जाती है। श्री कृष्ण अत्यंत तर्कपूर्ण, कूटनीतिक और धर्मसम्मत वाणी में महाराज धृतराष्ट्र, पितामह भीष्म और दुर्योधन को संबोधित करते हैं। वे कहते हैं कि युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। वे दुर्योधन से आग्रह करते हैं कि वह पांडवों को केवल 5 गांव दे दे और बाकी पूरा साम्राज्य स्वयं भोगे। भीष्म, द्रोण और विदुर श्री कृष्ण के इस प्रस्ताव का पुरजोर समर्थन करते हैं और दुर्योधन को समझाते हैं कि श्री कृष्ण से दुश्मनी मोल लेना साक्षात काल को निमंत्रण देना है। लेकिन दुर्योधन अहंकार में अंधा होकर इस शांति प्रस्ताव को पूरी तरह से ठुकरा देता है। यह एपिसोड श्री कृष्ण की कूटनीतिक गहराई और दुर्योधन के पतन की ओर बढ़ते अड़ियल रवैये को अत्यंत भव्यता से पेश करता है।

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Movie Details

Language

Hindi

Category

mahabharat

Duration

Episode 44

Release Year

1988

Mahabharat EP 44 - श्री कृष्ण पांडवों के दूत बनकर पहुँचे धृतराष्ट्र की सभा में | महाभारत एक धर्म युद्ध
HD
9.5

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