Mahabharat EP 46 - पांडवों और कौरव पहुँचे श्री कृष्ण से मदद माँगने | महाभारत एक धर्म युद्ध
Mahabharat EP 46 - पांडवों और कौरव पहुँचे श्री कृष्ण से मदद माँगने | महाभारत एक धर्म युद्ध
Description
महाभारत का तैंतालीसवां (43वां) एपिसोड युद्ध की तैयारियों, गठबंधन और उस ऐतिहासिक क्षण की कहानी है, जहाँ यह तय होता है कि महाभारत के युद्ध में साक्षात ईश्वर (श्री कृष्ण) किसके पक्ष में रहेंगे। श्री कृष्ण के शांतिदूत मिशन के विफल होने के बाद, अब दोनों पक्ष—कौरव और पांडव—यह जान चुके हैं कि युद्ध अटल है। ऐसे में पूरे आर्यावर्त के राजाओं को अपनी-अपनी ओर मिलाने की होड़ शुरू हो जाती है। द्वारिकाधीश श्री कृष्ण और उनकी अजेय 'नारायणी सेना' पूरे भारतवर्ष में सबसे शक्तिशाली मानी जाती है। इसलिए, उनका समर्थन प्राप्त करना दोनों पक्षों के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। इस उद्देश्य से दुर्योधन सबसे पहले अपने तेज रथ पर सवार होकर द्वारिका पहुँचता है। जब वह श्री कृष्ण के कक्ष में प्रवेश करता है, तो देखता है कि श्री कृष्ण अपनी शैया (बिस्तर) पर गहरी नींद में सो रहे हैं। दुर्योधन अपने अहंकार और राजसी घमंड के कारण श्री कृष्ण के सिरहाने (सिर के पास) रखे हुए एक ऊंचे और कीमती आसन पर जाकर बैठ जाता है। उसे लगता है कि वह हस्तिनापुर का युवराज है, इसलिए उसे सबसे ऊंचा स्थान मिलना चाहिए। कुछ ही देर बाद, अर्जुन भी श्री कृष्ण से सहायता मांगने द्वारिका पहुँचते हैं। अर्जुन, जिनके हृदय में श्री कृष्ण के प्रति अगाध भक्ति और विनम्रता है, चुपचाप जाकर श्री कृष्ण के चरणों (पैरों) के पास हाथ जोड़कर बैठ जाते हैं। जब श्री कृष्ण की नींद खुलती है, तो उनकी दृष्टि स्वाभाविक रूप से सबसे पहले अपने चरणों के पास बैठे अर्जुन पर पड़ती है। वे अर्जुन का स्वागत करते हैं। तभी पीछे से दुर्योधन बोल पड़ता है कि वह पहले आया था। श्री कृष्ण मुस्कुराते हैं और कहते हैं कि भले ही दुर्योधन पहले आया हो, लेकिन उन्होंने सबसे पहले अर्जुन को देखा है; और चूँकि अर्जुन आयु में छोटा भी है, इसलिए सहायता मांगने का पहला अधिकार अर्जुन को ही मिलेगा। श्री कृष्ण दोनों के सामने दो विकल्प रखते हैं—"एक तरफ मेरी अजेय, लाखों सैनिकों वाली और हथियारों से लैस 'नारायणी सेना' होगी, और दूसरी तरफ मैं अकेला रहूंगा, वह भी निहत्था, जो पूरे युद्ध में कोई भी अस्त्र या शस्त्र नहीं उठाएगा।" यह सुनकर दुर्योधन घबरा जाता है कि कहीं अर्जुन सेना न मांग ले। लेकिन अर्जुन, जो जानते हैं कि जहाँ नारायण हैं, वहीं विजय है, बिना एक पल गंवाए निहत्थे श्री कृष्ण को चुन लेते हैं। अर्जुन कहते हैं कि उन्हें सेना नहीं, केवल अपने सखा का साथ चाहिए। अर्जुन का यह चुनाव देखकर दुर्योधन मन ही मन अत्यधिक प्रसन्न होता है। वह सोचता है कि अर्जुन बहुत बड़ा मूर्ख है जिसने एक निहत्थे इंसान के लिए इतनी बड़ी और शक्तिशाली सेना छोड़ दी। दुर्योधन नारायणी सेना लेकर खुशी-खुशी हस्तिनापुर लौट जाता है। दुर्योधन के जाने के बाद, श्री कृष्ण अर्जुन से पूछते हैं कि उन्होंने एक बिना लड़ने वाले व्यक्ति को क्यों चुना? तब अर्जुन अत्यंत भावुक होकर कहते हैं कि वे चाहते हैं कि श्री कृष्ण युद्ध में उनके रथ के 'सारथी' (Charioteer) बनें और उनका मार्गदर्शन करें। श्री कृष्ण अर्जुन के इस प्रेमपूर्ण प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं और यहीं से वे 'पार्थसारथी' (अर्जुन के सारथी) कहलाते हैं। यह एपिसोड इस शाश्वत सत्य को सिद्ध करता है कि भौतिक शक्तियां चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, यदि ईश्वर आपके साथ (सारथी के रूप में) है, तो जीत निश्चित है।
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Movie Details
Language
Hindi
Category
mahabharat
Duration
Episode 46
Release Year
1988












