Mahabharat EP 47 - कर्ण ने सुनाई अपने सुत पुत्र के कहलाने के पीछे की कथा | महाभारत एक धर्म युद्ध

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Mahabharat EP 47 - कर्ण ने सुनाई अपने सुत पुत्र के कहलाने के पीछे की कथा | महाभारत एक धर्म युद्ध

9.5
Episode 47
1988
HDMythologyDramaHistory

Description

महाभारत का चवालीसवां (44वां) एपिसोड महाकाव्य के सबसे दुखद, संघर्षपूर्ण और महान योद्धा—सूर्यपुत्र कर्ण—की अनकही और पीड़ादायक जीवनगाथा को विस्तार से प्रस्तुत करता है। युद्ध की रणभेरी बजने वाली है, और ऐसे समय में कर्ण का चरित्र सबसे अधिक जटिल और भावनात्मक रूप से उलझा हुआ दिखाई देता है। कर्ण को जीवन भर समाज से केवल अपमान, तिरस्कार और 'सूत पुत्र' (रथ हांकने वाले का बेटा) होने का ताना मिला है, जबकि वास्तव में वह सूर्य देव और माता कुंती का ज्येष्ठ और सबसे प्रतापी पुत्र है। यह एपिसोड कर्ण के अपने अतीत की उन कड़वी यादों और संघर्षों को उजागर करता है, जिन्होंने उसे आज इस मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया है। कर्ण याद करता है (या किसी पात्र को सुनाता है) कि कैसे उसके जन्म के समय कुंती एक अविवाहित राजकुमारी थी, और समाज के डर और लोक-लाज से बचने के लिए उसने अपने नवजात शिशु (जिसके शरीर पर जन्म से ही दिव्य कवच और कुंडल थे) को एक टोकरी में रखकर गंगा नदी में बहा दिया था। उस बहते हुए बच्चे को धृतराष्ट्र के सारथी 'अधिरथ' और उनकी पत्नी 'राधा' ने नदी से निकाला और उसे अपने सगे बेटे की तरह पाला। इसलिए कर्ण को 'राधेय' और 'सूत पुत्र' कहा जाने लगा। कर्ण के भीतर बचपन से ही एक महान क्षत्रिय और सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनने की आग थी। लेकिन जब वह शस्त्र विद्या सीखने के लिए गुरु द्रोणाचार्य के पास गया, तो द्रोण ने उसे यह कहकर शिक्षा देने से साफ इनकार कर दिया कि वह एक सूत (निचली जाति) का पुत्र है और द्रोण केवल क्षत्रिय राजकुमारों (कौरवों और पांडवों) को ही शिक्षा देते हैं। इस भयंकर जातीय भेदभाव और अपमान ने कर्ण के हृदय में एक गहरा घाव कर दिया। अपने हुनर को निखारने के लिए, कर्ण ने ब्राह्मण का भेष धारण किया और भगवान परशुराम (जो केवल ब्राह्मणों को शिक्षा देते थे) के पास जाकर अपनी पूरी लगन से दिव्यास्त्रों और ब्रह्मास्त्र का ज्ञान प्राप्त किया। लेकिन नियति ने वहां भी कर्ण के साथ क्रूर मजाक किया। एक दिन जब परशुराम कर्ण की जांघ पर सिर रखकर सो रहे थे, तो एक भयानक कीड़े (भृंगी) ने कर्ण की जांघ को काट लिया। अपने गुरु की नींद न टूटे, इसलिए कर्ण ने उस असहनीय दर्द को चुपचाप सह लिया और अपना खून बहने दिया। जब परशुराम की नींद खुली और उन्होंने इतना खून देखा, तो वे समझ गए कि इतना दर्द सहने की क्षमता किसी ब्राह्मण में नहीं, बल्कि केवल एक क्षत्रिय में हो सकती है। परशुराम ने क्रोध में आकर कर्ण को यह भयानक श्राप दे दिया कि "जिस विद्या को तूने मुझसे झूठ बोलकर सीखा है, जब तुझे अपने जीवन में उसकी सबसे अधिक आवश्यकता होगी (अपने अंतिम युद्ध में), तब तू उस विद्या को भूल जाएगा।" इतना ही नहीं, कर्ण को एक ब्राह्मण का भी श्राप मिला था कि अंतिम युद्ध में उसके रथ का पहिया धरती निगल लेगी। यह एपिसोड दर्शकों को कर्ण के उस असीम दर्द, समाज के दोहरे मापदंडों और एक ऐसे इंसान की त्रासदी (Tragedy) से जोड़ता है जो अपनी योग्यता के बावजूद जीवन भर केवल अपनी जाति के कारण प्रताड़ित हुआ। कर्ण की यह कथा यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि यदि समाज ने उसे अपनाया होता, तो क्या महाभारत का इतिहास कुछ और होता?

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Movie Details

Language

Hindi

Category

mahabharat

Duration

Episode 47

Release Year

1988

Mahabharat EP 47 - कर्ण ने सुनाई अपने सुत पुत्र के कहलाने के पीछे की कथा | महाभारत एक धर्म युद्ध
HD
9.5

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