Mahabharat EP 50 - कौरव और पांडवों की युद्ध की तैयारी | महाभारत एक धर्म युद्ध
Description
महाभारत का सैंतालीसवां (47वां) एपिसोड कुरुक्षेत्र की उस पवित्र और भयावह भूमि पर दोनों सेनाओं के पड़ाव डालने, युद्ध के नियमों को तय करने और कुछ महत्वपूर्ण अंतिम क्षणों की कहानी है। कुरुक्षेत्र का मैदान अब तंबुओं, हाथियों, घोड़ों और लाखों सैनिकों से भर चुका है। कौरव और पांडव सेनाओं के शिविर (Camps) एक-दूसरे के आमने-सामने लग चुके हैं। युद्ध शुरू होने से पहले, प्राचीन वैदिक परंपराओं के अनुसार दोनों पक्षों के सेनापति और प्रमुख योद्धा एक साथ बैठते हैं और 'धर्मयुद्ध' के कुछ अत्यंत कड़े नियम तय करते हैं। नियमों के अनुसार—युद्ध केवल सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक ही लड़ा जाएगा; सूर्यास्त के बाद दोनों पक्ष एक-दूसरे के शिविरों में मित्रवत आ-जा सकेंगे; एक योद्धा केवल एक ही योद्धा से (द्वंद्व युद्ध) लड़ेगा; रथी रथी से और पैदल सैनिक पैदल से लड़ेगा; जो सैनिक निहत्था हो गया हो, पीठ दिखाकर भाग रहा हो, या जिसने आत्मसमर्पण कर दिया हो, उस पर कोई वार नहीं करेगा। ये नियम यह सुनिश्चित करते हैं कि यह युद्ध कोई साधारण कत्लेआम नहीं, बल्कि धर्म का युद्ध हो। इसी दौरान, श्री कृष्ण के बड़े भाई, दाऊ बलराम वहां पधारते हैं। बलराम जी दुर्योधन (जो उनका प्रिय शिष्य है) और भीम दोनों से स्नेह करते हैं। इसलिए वे घोषणा करते हैं कि वे इस विनाशकारी युद्ध में किसी भी पक्ष का साथ नहीं देंगे और तीर्थयात्रा पर चले जाएंगे। इसके अलावा, रुक्मिणी का भाई 'रुक्मी' (जो खुद को बहुत बड़ा शूरवीर मानता है) अपनी सेना लेकर आता है। वह अहंकार में चूर होकर पहले अर्जुन और फिर दुर्योधन को अपनी सहायता का प्रस्ताव देता है और कहता है कि वह अकेला ही युद्ध जिता सकता है। लेकिन उसके इस अहंकार के कारण अर्जुन और दुर्योधन दोनों ही उसे अपनी सेना से दुत्कार कर भगा देते हैं। यह एपिसोड युद्ध से ठीक पहले की उस 'शांति' और मनोवैज्ञानिक तनाव (Calm before the storm) को बहुत ही बेहतरीन तरीके से पर्दे पर पेश करता है, जहां हर योद्धा को पता है कि कल से खून की नदियां बहने वाली हैं।
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Movie Details
Language
Hindi
Category
mahabharat
Duration
Episode 50
Release Year
1988












