Mahabharat EP 54 - श्री कृष्ण गीता उपदेश | इंद्रियों को वश में रखने का उपदेश | कर्म योग का ज्ञान | महाभारत एक धर्म युद्ध
Mahabharat EP 54 - श्री कृष्ण गीता उपदेश | इंद्रियों को वश में रखने का उपदेश | कर्म योग का ज्ञान | महाभारत एक धर्म युद्ध
Description
महाभारत का इक्यावनवां (51वां) एपिसोड सम्पूर्ण मानव जाति के लिए सबसे बड़ा आध्यात्मिक और दार्शनिक उपहार है—'श्रीमद्भगवद्गीता' का उद्भव। कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में दोनों सेनाएं आमने-सामने खड़ी हैं। अर्जुन, जो पांडवों के सबसे बड़े योद्धा हैं, अपने सारथी भगवान श्री कृष्ण से कहते हैं कि वे रथ को दोनों सेनाओं के बीच ले चलें ताकि वे देख सकें कि उन्हें किन-किन लोगों से युद्ध करना है। जब रथ बीच में पहुँचता है, तो अर्जुन अपने सामने पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, और अपने सगे भाइयों (कौरवों) को मृत्यु के लिए खड़ा देखते हैं। अपने ही स्वजनों के खून से सने राजसिंहासन की कल्पना मात्र से अर्जुन का हृदय कांप उठता है। वे गहरे मोह, शोक और अज्ञान के अंधकार में डूब जाते हैं। उनका शरीर कांपने लगता है, हाथ से उनका अजेय धनुष 'गांडीव' छूटकर गिर जाता है। अर्जुन रोते हुए श्री कृष्ण से कहते हैं कि वे युद्ध नहीं करेंगे, क्योंकि अपनों को मारकर मिलने वाले राज्य से भिक्षा मांगकर जीना श्रेष्ठ है。 अर्जुन की इस कायरता और मोह को देखकर श्री कृष्ण मुस्कुराते हैं और यहीं से शुरू होता है वह दिव्य उपदेश जो युगों-युगों तक मानवता का मार्गदर्शन करने वाला है। श्री कृष्ण अर्जुन को 'कर्म योग' (Karma Yoga) और 'आत्मा की अमरता' का ज्ञान देते हैं। वे समझाते हैं कि "हे पार्थ! तुम उनके लिए शोक कर रहे हो जो शोक के योग्य नहीं हैं। शरीर नश्वर है, यह आज नहीं तो कल मरेगा ही, परंतु आत्मा अजर-अमर है। जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नए शरीर में प्रवेश करती है। आत्मा को न तो शस्त्र काट सकते हैं, न आग जला सकती है, न जल गला सकता है और न हवा सुखा सकती है।" श्री कृष्ण अर्जुन को उनके 'क्षत्रिय धर्म' का स्मरण कराते हैं। वे कहते हैं कि एक क्षत्रिय के लिए धर्म-युद्ध से बढ़कर कोई कल्याणकारी कार्य नहीं है। यदि तुम युद्ध से भागोगे, तो दुनिया तुम्हें कायर कहेगी और तुम्हारा घोर अपमान होगा। श्री कृष्ण अर्जुन को इंद्रियों को वश में रखने (Control of Senses) का उपदेश देते हैं। वे बताते हैं कि इंसान का मन हवा से भी अधिक चंचल है, और जब तक मन पर नियंत्रण नहीं होगा, तब तक कोई भी कार्य सिद्ध नहीं हो सकता। श्री कृष्ण का यह उपदेश अर्जुन के भीतर के अज्ञान के जालों को काटने लगता है।
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Movie Details
Language
Hindi
Category
mahabharat
Duration
Episode 54
Release Year
1988












