Mahabharat EP 55 - सुख की परिभाषा | बुद्धि की स्थिरता | कर्म और ज्ञान की परिभाषा | महाभारत एक धर्म युद्ध
Mahabharat EP 55 - सुख की परिभाषा | बुद्धि की स्थिरता | कर्म और ज्ञान की परिभाषा | महाभारत एक धर्म युद्ध
Description
महाभारत का बावनवां (52वां) एपिसोड श्रीमद्भगवद्गीता के अत्यंत गूढ़, दार्शनिक और व्यावहारिक ज्ञान पर केंद्रित है। अर्जुन, जिनके मन के संदेह धीरे-धीरे दूर हो रहे हैं, श्री कृष्ण से पूछते हैं कि "हे केशव! एक 'स्थितप्रज्ञ' (Sthitaprajna - वह व्यक्ति जिसकी बुद्धि स्थिर हो चुकी है) के क्या लक्षण होते हैं? वह कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?" श्री कृष्ण अर्जुन को सुख और दुख की वास्तविक परिभाषा समझाते हुए एक बहुत ही वैज्ञानिक और आध्यात्मिक क्रम बताते हैं। श्री कृष्ण कहते हैं, "हे अर्जुन! जब मनुष्य इंद्रियों के विषयों (भौतिक सुखों) के बारे में सोचता है, तो उसके मन में उनके प्रति 'लगाव' (Attachment) पैदा होता है। लगाव से 'कामना' (Desire) उत्पन्न होती है। जब कामना पूरी नहीं होती, तो 'क्रोध' (Anger) जन्म लेता है। क्रोध से इंसान की 'बुद्धि' (Intellect) भ्रष्ट हो जाती है, बुद्धि के भ्रष्ट होने से स्मृति (Memory) नष्ट हो जाती है, और स्मृति नष्ट होने से मनुष्य का पूरी तरह से पतन हो जाता है।" श्री कृष्ण समझाते हैं कि जो व्यक्ति सुख और दुख, लाभ और हानि, जय और पराजय को समान समझकर अपना कार्य करता है, वही सच्चा योगी है। इसके बाद श्री कृष्ण 'कर्म योग' और 'ज्ञान योग' की विस्तार से व्याख्या करते हैं। वे अर्जुन से कहते हैं—"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन" (तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में नहीं)। श्री कृष्ण समझाते हैं कि इंसान को फल की इच्छा (Attachment to results) त्याग कर निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। जो व्यक्ति फल की चिंता किए बिना अपना कर्म करता है, वह ईश्वर को प्राप्त होता है। श्री कृष्ण अर्जुन को यह भी बताते हैं कि अकर्मण्यता (कुछ न करना) कर्म करने से भी ज्यादा बुरा है। इस एपिसोड में श्री कृष्ण द्वारा दी गई सुख-शांति की परिभाषाएं आज के आधुनिक जीवन की चिंताओं और अवसादों (Depression) को दूर करने का सबसे अचूक उपाय प्रस्तुत करती हैं।
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Movie Details
Language
Hindi
Category
mahabharat
Duration
Episode 55
Release Year
1988












